Hazaribagh: हजारीबाग की जनता ने बदलाव के सपने देखकर वोट दिया था, लेकिन तीन महीने के भीतर ही नगर निगम की तस्वीर ऐसी हो गई है मानो विकास को किसी ने नगर भवन के बाहर ही बंधक बना दिया हो. शहर में 10 प्रतिशत टैक्स बढ़ा दिया गया, लेकिन बदले में जनता को क्या मिला? टूटी सड़कें, बजबजाती नालियां, बूंद-बूंद पानी और हर तरफ प्रशासनिक अव्यवस्था. नगर निगम की हालत ऐसी है कि जनता अब सुविधाओं की उम्मीद नहीं, बल्कि भगवान भरोसे मौसम कटने की प्रार्थना कर रही है.
बरसात नजदीक, बजबजा रही शहर की नालियां
बरसात आने में अब मुश्किल से एक महीना बचा है और शहर की नालियां कचरे से पटी पड़ी हैं. सड़कों पर गड्ढे मौत का निमंत्रण दे रहे हैं. पेयजल व्यवस्था इतनी बदहाल है कि महीने में एक बार पानी मिल जाए तो लोग खुद को सौभाग्यशाली समझते हैं.

लेकिन नगर निगम की टीम जनता की परेशानी समझने नहीं, बल्कि घर-घर यह जांचने निकलती है कि आखिर लोगों ने पानी के लिए मोटर क्यों लगा रखी है. सवाल यह है कि जब पानी मिलेगा ही नहीं तो जनता आखिर करे क्या?
नगर निगम बोर्ड की बैठक भी विवाद की भेंट चढ़ी
बुधवार को नगर निगम बोर्ड की चौथी बैठक भी बिना किसी निर्णय के स्थगित हो गई. महापौर अरविंद राणा कार्यालय में मौजूद थे, लेकिन नगर आयुक्त ओमप्रकाश गुप्ता बैठक से गायब रहे. महापौर और नगर आयुक्त के बीच चल रही खींचतान अब खुली लड़ाई का रूप ले चुकी है.
खुद महापौर ने पत्रकारों के सामने स्वीकार किया कि “इस तरह नगर निगम नहीं चल सकता” और इस बार बरसात में शहर को भारी परेशानी झेलनी पड़ेगी.
जनता किससे उम्मीद करे
असल सवाल यही है कि जब सत्ता और सिस्टम दोनों ही हाथ खड़े कर चुके हों, तब जनता आखिर किससे उम्मीद करे? हज़ारीबाग की जनता अब शायद बरसात में जलमग्न सड़कों पर खड़े होकर यही समझेगी कि वोट की असली कीमत क्या होती है.
शहरवासी इस बात से भली-भांति परिचित हैं कि चाहे महापौर अरविंद राणा रहें या कोई और, चाहे नगर निगम आयुक्त ओमप्रकाश गुप्ता रहें या कोई और, इस शहर की नियति कोई नहीं बदल सकता. यहां के लोग बस टैक्स देने और वोट डालने तक सीमित रह गए हैं. बहुत कुछ ज्यादा हुआ तो बस सोशल मीडिया पर पोस्ट डालकर अपनी भड़ास निकाल लेंगे, क्योंकि उनकी जिम्मेदारी भी टैक्स और वोट देकर खत्म हो जाती है.
