Akshay Kumar Jha
Ranchi: झारखंड में जिसने भी थोड़ा समय बिताया वो महुआ के मायने को जानता है. उसकी महक से ही झारखंड की स्वाद समझ में आ जाती है. लेकिन, उससे बनने वाली शराब को सूबे में काफी नफरत और तिरस्कार की नजरों से देखा जाता है. महुआ की खासियत को यूरोप ने पहचाना. जब देश में अंग्रेजों का राज था, तो उन्होंने महुआ से बनने वाली शराब को बैन तो किया ही, इसे ऐसे पेश किया जाने लगा जैसे यह मदिरा नहीं बल्कि जहर हो. वजह यह था कि उन्हें अपने देश में बनने वाली शराब को भारत में प्रमोट करना था. लेकिन, अब एक बार फिर महुआ से बनने वाली शराब ने धूम मचा रखी है. वो भी यूरोप में. चार जुलाई को विश्व की जानी-मानी मीडिया संस्थान, जो फाइनेंशियल खबरों के लिए जानी जाती है. उसने एक खबर प्रकाशित की. शार्षक है “Mahua, the banned Indian liquor is back on the menu”. इस लेख में महुआ से बनी शराब और उसकी खासियत को बताया गया है. बताया गया है कि कैसे महुआ से बनने वाली शराब को यूरोप में पसंद किया जा रहा है. कैसे महुआ से बनी शराब सिंगल मॉल्ट को फेल कर रही है.

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महुआ: फूलों से बनने वाली भारत की अनोखी पारंपरिक शराब
महुआ भारत की एक ऐसी पारंपरिक शराब है, जो पूरी तरह महुआ के पेड़ के फूलों से बनाई जाती है. इसे कई जगहों पर महुली या महुरा भी कहा जाता है. मध्य भारत के आदिवासी समुदाय सैकड़ों वर्षों से इसका निर्माण और सेवन करते आ रहे हैं. 19वीं सदी में ब्रिटिश शासन ने महुआ को खतरनाक नशीला पदार्थ मानकर इस पर रोक लगा दी थी. इसके बाद लोग इसे छिपकर बनाने लगे, जिससे कई बार जहरीली शराब बनने की घटनाएं भी हुईं. आजादी मिलने के बाद भी महुआ को लेकर लोगों के मन में गलत धारणा बनी रही. अब भारत के युवा शराब निर्माता महुआ को फिर से उसकी पहचान दिलाने की कोशिश कर रहे हैं. ब्रिटेन में अपने ब्रांड DesmondJi को लॉन्च करने वाले डेसमंड नाजरेथ कहते हैं कि महुआ सिर्फ एक शराब नहीं है, बल्कि यह भारत की संस्कृति, परंपरा और इतिहास से जुड़ी एक अनमोल धरोहर है. डेसमंड बताते हैं कि जब वो पहली बार महुआ के फूल खरीदने के लिए गांवों में गए, तो लोग उन्हें आबकारी विभाग का अधिकारी समझ बैठे. उन्हें लगा कि वे शराब बनाने वालों को पकड़ने आए हैं, इसलिए लोग उनसे दूर भागने लगे. लेकिन अब डेसमंड उन्हीं समुदायों के साथ मिलकर काम करते हैं और फूलों के बदले बाजार से लगभग दोगुनी कीमत देते हैं.

जानिए कैसे हो रहा यूरोप में महुआ से बनी शराब का कोराबार
वे बताते हैं कि महुआ के पूरे काम में महिलाओं की सबसे बड़ी भूमिका होती है. फूल चुनने, उन्हें सुखाने, बेचने, खरीदने और शराब बनाने तक, लगभग हर काम महिलाएं करती हैं. वो खुद भी इस पेय का सेवन करती हैं. इसलिए महुआ की पूरी परंपरा महिलाओं के योगदान पर टिकी हुई है. पारंपरिक तरीके से बनने वाली महुआ शराब को केवल एक बार आसवित (डिस्टिल) किया जाता है. इसमें लगभग 15 प्रतिशत अल्कोहल होती है और इसका स्वाद काफी गहरा और अलग होता है. भारतीय पेय विशेषज्ञ अनिरुद्ध मुखर्जी कहते हैं कि इसके स्वाद में कस्तूरी, पका कटहल, काली मिर्च, अमरूद की मिठास और चावल से बनी शराब जैसी खुशबू और स्वाद महसूस होता है. आजकल आधुनिक तरीके से बनने वाली महुआ शराब को तांबे के बर्तनों में दो बार डिस्टिल किया जाता है. इससे इसमें लगभग 40 प्रतिशत अल्कोहल हो जाती है और इसका स्वाद अधिक साफ, हल्का और फलों व फूलों जैसी खुशबू वाला होता है. इसे मोजिटो और डाइक्विरी जैसे कॉकटेल में भी इस्तेमाल किया जाता है या फिर बर्फ के साथ सीधे पिया जाता है. South Seas Distilleries का Six Brothers Mahura ब्रांड हाल ही में ऑस्ट्रेलिया में लॉन्च हुआ है. वहीं मध्य प्रदेश में अब केवल वही समुदाय कानूनी रूप से महुआ बना सकते हैं, जिनके पास इसे बनाने की पारंपरिक विरासत है. यहां Mond नाम का एक ब्रांड महिलाओं की सहकारी समिति द्वारा तैयार किया जाता है, हालांकि इसकी बिक्री अभी सीमित इलाकों तक ही है.
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महुआ की बढ़ रही लोकप्रियता
अनिरुद्ध मुखर्जी का कहना है कि महुआ की बढ़ती लोकप्रियता यह दिखाती है कि लोग अब भारतीय पारंपरिक पेयों पर गर्व करने लगे हैं. पहले भारतीय सिंगल माल्ट व्हिस्की और फिर भारतीय जिन को पहचान मिली. उनका मानना है कि खासकर पूर्वी भारत में आज भी कई पारंपरिक पेय मौजूद हैं, जिन्हें दुनिया के सामने लाया जाना बाकी है.
(यह लेख Financilatimes.com पोर्टल पर अंग्ररेजी में छपी है, जिसका यह हिंदी रुपातंरण है.)

अब सवाल यह है कि झारखंड में क्यों नहीं हो रहा ऐसा उपक्रम?
झारखंड में महुआ की कोई कमी नहीं है. चोरी-छिपे ग्रामीण इलाकों में महुआ से बनी शराब को खूब परोसा जाता है. अत्पाद विभाग की कार्रवाई की वजह से इसे एक अपराध वाला कारोबार माना जाता है. जब महुआ से बनी शराब यूरोप के देशों में परोसी जा सकती है, तो झारखंड में क्यों नहीं? इस कारोबार से रोजगार मिलने का विकल्प है. करोड़ों रुपए की कमायी हो सकती है. तो इसे झारखंड से क्यों अलग रखा गया है? उत्पाद विभाग और सरकार को चाहिए कि इस दिशा में एक सकारात्मक पहल करे और झारखंड में इस कारोबार को बढ़ावा देने की कोशिश हो.
साभारः Financialtimes.com

