बिहार की मिट्टी, बोकारो की शिक्षा और दिल्ली की पॉलिटिकल लैबोरेट्री, अब रांची के रण में झोकेंगे किस्मत

Ranchi : राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि जो दिखता है, वो बिकता है. लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने इस बार इस...

Ranchi : राजनीति में अक्सर कहा जाता है कि जो दिखता है, वो बिकता है. लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने इस बार इस जुमले को उलट दिया है. झारखंड राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस ने एक ऐसे चेहरे को मैदान में उतारकर सबको पॉलिटिकल शॉक दिया है, जो अमूमन कैमरों की फ्लैशलाइट से बचकर फाइलों और रणनीतियों में व्यस्त रहता था. हम बात कर रहे हैं प्रणव झा की. मल्लिकार्जुन खड़गे के दफ्तर की चाय का स्वाद तय करने से लेकर राहुल गांधी की मीडिया ब्रीफिंग के शब्द गढ़ने वाले प्रणव झा को अब सीधे संसद भेजने की तैयारी है. पर्दे के पीछे से डोरी हिलाने वाले इस रणनीतिकार की असली परीक्षा अब झारखंड विधानसभा के नंबर गेम में होनी है.

कहलगांव से लेकर एआईसीसी ( AICC ) के गलियारों तक का सफर

प्रणव झा का प्रोफाइल किसी ठेठ जमीन से जुड़े नेता जैसा नहीं, बल्कि एक कॉर्पोरेट स्टाइल वाले पॉलिटिकल मैनेजर जैसा है. मूल रूप से बिहार के भागलपुर (कहलगांव) के रहने वाले प्रणव का नाता झारखंड के बोकारो (सेक्टर-6) से भी है. स्कूली पढ़ाई बोकारो में हुई और कॉलेज के लिए दिल्ली विश्वविद्यालय पहुंचे. 1990 के दशक में बोकारो जिला युवा कांग्रेस और धनबाद संसदीय क्षेत्र में प्रभारी बनकर राजनीति का ककहरा सीखा. 2017 में कांग्रेस के संचार विभाग के सचिव बने. जब खड़गे अध्यक्ष बने, तो उनके दफ्तर को चलाने वाले चार विशेष समन्वयकों में प्रणव शामिल थे. अगस्त 2024 में उन्हें बकायदा एआईसीसी सचिव की गद्दी सौंपी गई.

16 अपनों का साथ और 12 अपनों की मेहरबानी का इम्तिहान

दिल्ली की वातानुकूलित बैठकों में गठबंधन का फॉर्मूला तय करना जितना आसान है, रांची की जमीन पर विधायकों को एकजुट रखना उतना ही टेढ़ा. 81 सदस्यीय विधानसभा में इंडिया गठबंधन का पलड़ा भारी तो है, लेकिन प्रणव झा के लिए राहें इतनी भी मखमली नहीं हैं. सबसे पहली चुनौती कांग्रेस के अपने 16 विधायकों को एक सुर में रखने की है. जहां अक्सर भीतरघात का खतरा मंडराता रहता है.जेएमएम, आरजेडी और भाकपा-माले के 12 विधायकों का समर्थन हासिल करना.

क्या है सियासी पेंच

अगर गठबंधन के सभी 28 विधायक एकजुट रहे, तभी दिल्ली के इस सिपहसालार की लॉटरी लगेगी. वरना, जरा सी भी फूट प्रणव झा के इस हाई प्रोफाइल डेब्यू का खेल बिगाड़ सकती है. कांग्रेस ने लंबे समय बाद किसी ऐसे चेहरे को राज्यसभा का टिकट दिया है, जो कभी चुनावी अखाड़े में नहीं उतरा. दो दशकों तक मीडिया मैनेजमेंट और संगठन की फाइलें पलटने वाले प्रणव के लिए यह अंधेरे में तीर चलाने जैसा है. देखना दिलचस्प होगा कि पर्दे के पीछे का यह माहिर खिलाड़ी, संसद के भीतर सीधे मोर्चे पर कैसी बल्लेबाजी करता है.

 

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