Laxmi Narayan Munda
Ranchi : भारत का संविधान विश्व का एक अनुपम दस्तावेज माना जाता है. जो विविधता को समाहित करते हुए कमजोर वर्गों की सुरक्षा का वादा करता है. अनुच्छेद 244 और पांचवीं अनुसूची आदिवासी बहुल क्षेत्रों (Scheduled Areas) के लिए विशेष प्रशासनिक व्यवस्था प्रदान करती है. सीएनटी (छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट) CNT, एसपीटी (संथाल परगना टेनेंसी एक्ट) SPT, पेसा (1996) PESA, वनाधिकार अधिनियम (2006) जैसे कानून आदिवासियों की जमीन, जंगल और संस्कृति की रक्षा के लिए बनाया गया. फिर भी सात दशकों से इन प्रावधानों की धज्जियां उड़ाई जा रही है. विकास के नाम पर विस्थापन, बाहरी आबादी का बसना, जमीन की लूट और यह लेख संवैधानिक मूल्यों, तथ्यों और न्याय की मांग पर आधारित है. सच्चा विकास तभी संभव है जब सबसे कमजोर को भी उसका हक मिले. आज आदिवासी समुदाय के अस्तित्व, पहचान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को चुनौती दिया जा रहा है.


संवैधानिक ढांचा और उसकी कमजोरियां
पांचवीं अनुसूची राज्यपाल को विशेष शक्तियां देती है. वे संसद या राज्य विधानमंडल के कानूनों को अनुसूचित क्षेत्रों में संशोधित या निलंबित कर सकते है. भूमि हस्तांतरण पर प्रतिबंध लगा सकते है, और शांति व सुशासन के लिए विनियम बना सकते है. राज्यपाल को अनुसूचित क्षेत्रों की वार्षिक रिपोर्ट राष्ट्रपति को भेजनी होती है. केंद्र सरकार और राष्ट्रपति की भी निगरानी की जिम्मेदारी है. पेसा ग्राम सभाओं को भूमि, लघु वन उत्पाद, खनन आदि पर अधिकार देता है. वनाधिकार अधिनियम पारंपरिक अधिकारों को मान्यता देता है. सीएनटी CNT और एसपीटी SPT जैसे राज्य कानून गैर-आदिवासियों को आदिवासी भूमि खरीदने से रोकते हैं. फिर भी इसकी हकीकत अलग है. खनन,डैम, कारखाने,रेलवे और बिजली परियोजनाओं के नाम पर बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ है. समता जजमेंट (1997) जैसे सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बावजूद सरकारी भूमि और वन भूमि गैर-आदिवासियों या कंपनियों को दी गई. पेसा के 25-30 साल बाद भी कई राज्यों में नियम नही बने या लागू नही हुए. ग्राम सभाओं की सहमति को अक्सर नजरअंदाज किया गया.
जनसांख्यिकीय परिवर्तन और भूमि लूट
झारखंड जैसे राज्य में जहां आदिवासी आबादी पहले बहुल थी, अब वह घटकर 26% के आसपास रह गई है. बाहरी आबादी का बसना, अवैध कब्जा और संवैधानिक प्रावधानों और नियम-कानूनों का पालन नहीं होने से आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में जनसांख्यिकीय बदलाव बड़े पैमाने पर हुआ. विकास परियोजनाओं ने लाखों आदिवासियों को बेघर किया, लेकिन पुनर्वास अक्सर अपर्याप्त रहा. इससे गरीबी, सांस्कृतिक विघटन और पलायन बढ़ा. राज्यपालों ने इन उल्लंघनों को रोकने में सक्रिय भूमिका क्यों नही निभाई? राष्ट्रपति,केंद्र और राज्य सरकारों की जवाबदेही कहां रही ? यह सवाल दशकों से पूछा जा रहा है, लेकिन जवाब मिलना बाकी है.
परिसीमन और आरक्षण घटाने की साजिश
वर्तमान में परिसीमन की चर्चा जोरों पर है. जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्निर्धारण आदिवासी आरक्षित सीटों को प्रभावित कर सकता है. अगर 75 वर्षों के संवैधानिक उल्लंघनों के कारण आदिवासी आबादी का अनुपात घटा है, तो क्या सिर्फ मौजूदा आंकड़ों के आधार पर आरक्षण घटाया जाना उचित है? एक आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता और चिंतक होने के नाते मेरा मानना है कि पहले इन उल्लंघनों की भरपाई हो आरक्षित सीटों को बढ़ाया जाए, प्रभावित परिवारों को मुआवजा और पुनर्वास मिले और अवैध कब्जों को हटाया जाए. परिसीमन से पहले पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में वास्तविक जनगणना, भूमि सर्वेक्षण और कानूनी समीक्षा जरूरी है. अन्यथा यह लोकतंत्र की सार्थकता पर सवाल खड़ा करेगा. इसके लिए राज्यपालों, राष्ट्रपतियों और सरकारों के कार्यकाल में हुए उल्लंघनों की जांच हो. दोषियों पर कार्रवाई हो.
आदिवासी जमीन का अवैध हस्तांतरण रद्द हो, आदिवासियों को जमीन वापस मिले
पेसा कानून और वनाधिकार कानून का सख्त क्रियान्वयन किया जाए. ग्राम सभाओं को वास्तविक शक्ति दी जाए. वहीं देश का विकास मॉडल आदिवासी-केंद्रित, पर्यावरण-अनुकूल विकास को आधार बनाया जाए. विस्थापन अंतिम विकल्प हो. देश में परिसीमन हो लेकिन उससे पहले संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघनों की भरपाई हो और उसी अनुपात में आदिवासियों की आरक्षित सीटें बढ़ाई जाए. ज्ञात हो कि आदिवासी समुदाय भारत की सांस्कृतिक विरासत और पर्यावरण सुरक्षा के संरक्षक हैं. उन्हें विकास का शिकार बनाने के बजाय विकास का भागीदार बनाना राष्ट्र की जिम्मेदारी है. संविधान हाथी के दांत जैसा नही होना चाहिए. दिखाने और काम करने दोनों के लिए. अगर हम वास्तविक लोकतंत्र चाहते हैं, तो आदिवासियों के साथ किए गए ऐतिहासिक अन्याय का हिसाब करने का समय आ गया है. न्याय में देरी अन्याय है और यह देरी अब और लंबी नही खिंचनी चाहिए. आदिवासी समुदाय की आवाज को सुना जाना चाहिए न कि दबाया जाना चाहिए.
लेखक के निजी विचार
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