Newsdesk : रांची जिले के पिठौरिया में स्थित राजा जगतपाल सिंह का किला झारखंड की सबसे रहस्यमयी ऐतिहासिक धरोहरों में से एक माना जाता है. स्थानीय लोगों का दावा है कि पिछले लगभग 200 वर्षों से इस किले पर हर साल बिजली गिरती है. कई बार बिजली गिरने से किले के हिस्से क्षतिग्रस्त भी हुए हैं. यही वजह है कि यह किला इतिहास प्रेमियों, शोधकर्ताओं और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है.

नागवंशी शासनकाल से जुड़ा है इतिहास

पिठौरिया कभी छोटानागपुर क्षेत्र का महत्वपूर्ण प्रशासनिक और सामरिक केंद्र हुआ करता था. राजा जगतपाल सिंह को इस क्षेत्र के प्रभावशाली जमींदारों और शासकों में गिना जाता था. किले का निर्माण उस दौर की स्थापत्य कला और सुरक्षा व्यवस्था को ध्यान में रखकर किया गया था. हालांकि समय के साथ किला खंडहर में बदलता चला गया.
1857 के विद्रोह से जुड़ी है सबसे चर्चित कथा

स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राजा जगतपाल सिंह ने अंग्रेजों का साथ दिया था. कहा जाता है कि स्वतंत्रता सेनानी ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव और पांडेय गणपत राय जैसे क्रांतिकारियों के खिलाफ अंग्रेजों की मदद करने के कारण राजा की काफी आलोचना हुई थी. लोककथाओं में वर्णित है कि फांसी से पहले ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव ने राजा जगतपाल सिंह को श्राप दिया था कि उनका किला कभी शांति नहीं देखेगा और उस पर लगातार आकाशीय बिजली गिरती रहेगी. तभी से लोग इस घटना को श्राप से जोड़कर देखते हैं.
हर साल बिजली गिरने की घटनाओं ने बढ़ाया रहस्य

ग्रामीणों का कहना है कि मानसून के दौरान किले के आसपास बिजली गिरना आम बात है. कई बुजुर्ग बताते हैं कि उन्होंने वर्षों से किले पर बिजली गिरते देखा है. इसी कारण किले के कई हिस्से क्षतिग्रस्त हो चुके हैं. हालांकि इन दावों का कोई आधिकारिक वैज्ञानिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, लेकिन स्थानीय मान्यताएं आज भी इस कहानी को जीवित रखे हुए हैं.
वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी है महत्वपूर्ण

विशेषज्ञों के अनुसार किले के ऊपर बार-बार बिजली गिरने का कारण उसकी भौगोलिक स्थिति भी हो सकती है. यह क्षेत्र अपेक्षाकृत ऊंचाई पर स्थित है और आसपास खुले भूभाग हैं. ऐसे स्थानों पर बिजली गिरने की संभावना अधिक रहती है. भूगर्भीय संरचना और खनिज तत्वों की मौजूदगी भी इसके पीछे एक संभावित कारण मानी जाती है.
खंडहर में भी जीवित है इतिहास

आज किले की अधिकांश दीवारें टूट चुकी हैं, लेकिन इसके अवशेष अब भी उस दौर की कहानी बयान करते हैं. पुरानी ईंटें, जर्जर संरचनाएं और किले के आसपास फैली वीरानी इसे और रहस्यमयी बना देती है. स्थानीय लोग इसे सिर्फ एक ऐतिहासिक स्थल नहीं बल्कि इतिहास, लोकविश्वास और प्रकृति के अद्भुत मेल के रूप में देखते हैं.
पर्यटन और शोध का बन सकता है बड़ा केंद्र

इतिहासकारों का मानना है कि यदि इस किले का संरक्षण और वैज्ञानिक अध्ययन किया जाए तो इसके कई अनछुए पहलुओं से पर्दा उठ सकता है. यह स्थल झारखंड के इतिहास, 1857 के विद्रोह और स्थानीय लोककथाओं को समझने के लिए महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है.
श्राप या विज्ञान, रहस्य अब भी कायम

पिठौरिया का जगतपाल सिंह किला आज भी एक अनसुलझा रहस्य बना हुआ है. कुछ लोग इसे ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव के श्राप का परिणाम मानते हैं, जबकि वैज्ञानिक इसे प्राकृतिक और भौगोलिक कारणों से जोड़ते हैं. सच चाहे जो भी हो, लेकिन यह किला झारखंड की उन विरासतों में शामिल है जो इतिहास और रहस्य दोनों को एक साथ संजोए हुए हैं
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