रामनवमी की आस्था की विरासत, रांची में 97 तो हजारीबाग में 108 साल पुरानी परंपरा

रांचीः राजधानी रांची में रामनवमी की धूम है. विभिन्न अखाड़ों द्वारा शोभायात्रा की तैयारी भी की जा रही है. 27 मार्च को...

रांचीः राजधानी रांची में रामनवमी की धूम है. विभिन्न अखाड़ों द्वारा शोभायात्रा की तैयारी भी की जा रही है. 27 मार्च को रामनवमी है. अगर राजधानी रांची में रामनवमी की शोभायात्रा पर गौर करें तो यह पिछले 97 साल से निकाली जा रही है. सिर्फ कोरोना काल में शोभायात्रा निकालने की इजाजत नहीं मिली थी.

महज पांच लोगों ने मिलकर वर्ष 1929 में डॉ रामकृष्ण लाल और उनके भाई कृष्ण लाल ने अपने 3 दोस्त जगन्नाथ साहू, गुलाब नारायण तिवारी और लक्ष्मण राम मोची के साथ मिलकर पहली बार रामनवमी की शोभायात्रा निकाली. शोभायात्रा में आसपास के 40-50 लोग शामिल हुए. शोभायात्रा डोरंडा के तपोवन मंदिर तक गई.

1936 में महावीर मंडल का गठन

वर्ष 1936 में महावीर मंडल का गठन किया गया. नाम रखा गया श्री महावीर मंडल केंद्रीय कमेटी. इसके प्रथम अध्यक्ष महंत ज्ञान प्रकाश उर्फ नागा बाबा तथा महामंत्री डॉ रामकृष्ण लाल बनाए गए. इसके बाद महावीर मंडल के नेतृत्व में रामनवमी का जुलूस निकाला गया. जुलूस पहली बार डोरंडा के तपोवन स्थित राम मंदिर तक गया. तब से जुलूस तपोवन मंदिर तक जाने लगा. रांची में श्री महावीर मंडल केंद्रीय कमेटी के नेतृत्व में ही रामनवमी महोत्सव का आयोजन होता है.

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हजारीबाग में 108 सालों से निकाली जा रही है शोभायात्रा

हजारीबाग में पिछले 108 साल से रामनवमी की शोभायात्रा निकाली जा रही है. इसकी शुरुआत 1918 में मंदिरों के भ्रमण से हुई थी. उस साल सबसे पहले हजारीबाग में गुरु सहाय ने महावीरी झंडा निकालने की शुरुआत की थी. उन्होंने पांच दोस्तों के साथ शहर के विभिन्न मंदिरों का भ्रमण किया, फिर जुलूस निकालने की परंपरा की शुरुआत की. तब उनकी टीम ने बड़ा अखाड़ा स्थित राम जानकी मंदिर में पहले पूजा-अर्चना कर महावीरी पताका लेकर गाजे-बाजे के साथ विभिन्न मंदिरों का भ्रमण किया था. गुरु सहाय और उनके दोस्त बड़ा अखाड़ा के बाद महावीरी झंडा लेकर महावीर स्थान, छोटकी ग्वालटोली, पंचमंदिर चौक, जामा मस्जिद होते हुए सत्यनारायण मंदिर, सरदार चौक, पुराना बस स्टैंड शिव मंदिर, बुढ़वा महादेव मंदिर और छठ तालाब सूर्य मंदिर तक जुलूस लेकर पहुंचे थे. इस कारण इसे आज भी जुलूस मार्ग माना जाता है.

रामनवमी समिति का हुआ गठन

गुरु सहाय के निधन के बाद उनके परिवार वालों और समाज के लोगों ने रामनवमी समिति का गठन किया और जुलूस निकालने की परंपरा को आगे बढ़ाया. रामनवमी समिति से जुड़े लोग तब बड़ा अखाड़ा में सब कुछ तय किया करते थे. उसके बाद नवमी और दशमी को महावीरी झंडा और जुलूस के रूप में हर साल राम जन्म उत्सव मनाया जाने लगा. जुलूस की परंपरा को हीरालाल महाजन, कर्मवीर, पाचू गोप, टीभर गोप जैसे राम भक्तों ने आगे बढ़ाया. तब महावीरी झंडा पारंपरिक ढोल, डफला और बांसुरी के साथ निकाला जाता था.

1970 में पहली बार आई ताशा पार्टी

1970 में बड़ी बाजार ग्वालटोली ने सबसे पहले ताशा पार्टी लाई. उसी समय से ताशा बजाने की परंपरा शुरू हुई. इसके बाद ताशा पार्टी की धुन पर रामनवमी जुलूस निकलने लगा. कोलकाता से ताशा पार्टी के आने की शुरुआत हुई और रामनवमी के जुलूस का स्वरूप बदलता चला गया. भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय ने देश के जिन प्रमुख पर्व-त्योहारों की सूची बनाई है, उसमें हजारीबाग की रामनवमी का भी उल्लेख किया गया है. इसमें कहा गया है कि हजारीबाग की रामनवमी और जुलूस की झांकियां देखने के लिए राज्य के विभिन्न जिलों के साथ-साथ पड़ोसी राज्यों से भी लोग पहुंचते हैं. हजारीबाग से निकलने वाला रामनवमी जुलूस अब विश्व विख्यात रूप ले चुका है. हजारीबाग की रामनवमी को इंटरनेशनल रामनवमी के रूप में भी जाना जाने लगा है.

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