Ranchi: झारखंड में मैट्रिक की परीक्षा दे चुके 4,23,821 छात्र-छात्राओं के लिए इस साल इंटर (11वीं) में दाखिला लेना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगा. राज्य सरकार द्वारा 62 अंगीभूत कॉलेजों से इंटर की पढ़ाई पूरी तरह बंद करने और इसे प्लस टू स्कूलों में शिफ्ट करने के फैसले ने सीटों के समीकरण को जटिल बना दिया है. हालांकि सरकार का दावा है कि सीटें पर्याप्त हैं, लेकिन प्रतिष्ठित संस्थानों में दाखिले के लिए छात्रों के बीच कट-ऑफ की जंग तेज होने वाली है. राज्य गठन के समय मात्र 59 प्लस टू स्कूल थे, जो अब बढ़कर 642 हो गए हैं. इसके अलावा 336 विशेष कोटि के विद्यालय भी संचालित हैं.
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अंगीभूत कॉलेजों का संकट
रांची वीमेंस कॉलेज, मारवाड़ी कॉलेज और डोरंडा कॉलेज जैसे बड़े संस्थानों में अब इंटर में दाखिला नहीं होगा. यहां हर साल लगभग 90 हजार छात्र नामांकन लेते थे, जो अब प्लस टू स्कूलों की ओर रुख करेंगे.
हर साल 80 हजार छात्र छोड़ते हैं झारखंड
झारखंड में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और पसंदीदा स्ट्रीम (विशेषकर साइंस) में सीटों की कमी के कारण छात्रों का दूसरे राज्यों में पलायन एक बड़ी समस्या है. हर साल लगभग 80,000 से 1,00,000 छात्र इंटरमीडिएट और कोचिंग के लिए दूसरे राज्यों का रुख करते हैं. झारखंड के छात्र मुख्य रूप से बिहार (पटना), राजस्थान (कोटा), दिल्ली और ओडिशा जाते हैं.
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क्या है छात्रों के पलायन का कारण?
सरकारी प्लस टू स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी और प्रयोगशालाओं का अभाव है. छात्र बेहतर एक्सपोज़र और प्रतियोगी परीक्षाओं (जेईई- नीट) की तैयारी के लिए राज्य छोड़ना बेहतर समझते हैं.
क्या हैं चुनौतियां?
पिछले सत्र (2025-27) में लगभग 50,000 छात्रों के भविष्य पर संकट मंडरा रहा है क्योंकि कई वित्तरहित संस्थानों ने निर्धारित सीट (128) से 3 से 5 गुना ज्यादा नामांकन ले लिया था, जिन्हें अब तक जैक से अनुमति नहीं मिली है. ग्रामीण इलाकों के प्लस टू स्कूलों में सीटें खाली रह जाती हैं, जबकि रांची, जमशेदपुर, धनबाद और बोकारो जैसे शहरों के स्कूलों में एक-एक सीट के लिए मारामारी होती है. 642 प्लस टू स्कूलों में से कई ऐसे हैं जहां केवल दो से तीन शिक्षक ही पूरे इंटर सेक्शन को संभाल रहे हैं.
