रांचीः झारखंड की ब्यूरोक्रेसी ने समय-समय पर अपनी मेधा का लोहा मनवाया है. चाहे वह भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस हो या फिर सुदूर गांवों तक विकास की किरण पहुंचाना, झारखंड कैडर के इन चुनिंदा आईएएस अधिकारियों ने अपनी डिसीजन मेकिंग से यह साबित किया है कि अगर इरादे नेक हों, तो व्यवस्था को बदला जा सकता है. इन अधिकारियों ने अपनी बेदाग छवि, कड़क अनुशासन और जन-सरोकार वाले फैसलों से जनता का विश्वास जीता. इन अधिकारियों ने न केवल व्यवस्था के जंग को साफ किया, बल्कि संकट के समय राज्य के लिए संकटमोचक की भूमिका भी निभाई.
क्विक रिस्पॉन्स सिस्टम और टेक्नोलॉजी का समावेश
इन अधिकारियों की सफलता के पीछे मुख्य रूप से क्विक रिस्पॉन्स सिस्टम और टेक्नोलॉजी का समावेश रहा है. राज्य में जहां नक्सलवाद और विस्थापन जैसी समस्याएं रही हैं, इन अधिकारियों ने स्थानीय लोगों का भरोसा जीतकर विकास कार्यों को गति दी. इन अधिकारियों ने यह स्पष्ट किया है कि प्रशासनिक सेवा केवल पद नहीं, बल्कि जवाबदेही का दूसरा नाम है. इनके द्वारा लिए गए निर्णयों का परिणाम है कि आज राज्य के कई विभाग डिजिटलाइजेशन और पारदर्शिता के मामले में अग्रणी हैं.
प्रशासनिक दक्षता के मिसाल हैं ये अफसर
अमित खरे (1985 बैच): अमित खरे का नाम झारखंड के इतिहास में चारा घोटाले का भंडाफोड़ करने वाले निडर अधिकारी के रूप में दर्ज है. उन्होंने चाईबासा के उपायुक्त रहते हुए करोड़ों की अवैध निकासी को पकड़ा. एक शक्तिशाली राजनीतिक सिंडिकेट के खिलाफ खड़े होना उनके करियर का सबसे बड़ा जोखिम था. बाद में केंद्र में उच्च शिक्षा सचिव रहते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति को अमलीजामा पहनाने में उनकी मुख्य भूमिका रही.

एनएन सिन्हा (1987 बैच): झारखंड में सड़क नेटवर्क और ग्रामीण विकास की योजनाओं को वैज्ञानिक तरीके से लागू करने का श्रेय उन्हें जाता है.इन्होंने भू-अधिग्रहण की जटिल समस्याओं को सुलझाने के लिए प्रो-एक्टिव दृष्टिकोण अपनाया, जिससे राज्य की कई बड़ी सड़क परियोजनाएं समय पर पूरी हो सकीं.

सुखदेव सिंह (1987 बैच): पूर्व मुख्य सचिव सुखदेव सिंह को उनकी सादगी और गंभीर निर्णय क्षमता के लिए जाना जाता है. कोविड-19 महामारी के दौरान झारखंड में ऑक्सीजन और बेड मैनेजमेंट के उनके मॉडल की देशभर में सराहना हुई. उन्होंने हमेशा वित्तीय अनुशासन को प्राथमिकता दी और लोकलुभावन घोषणाओं के बजाय राज्य के राजकोषीय स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए कड़े फैसले लिए.

राजबाला वर्मा (1983 बैच): रांची रिंग रोड और फ्लाईओवरों के निर्माण को गति देना. उनकी कार्यशैली फील्ड वर्क पर आधारित थी, जहां वे खुद आधी रात को निर्माण स्थलों का निरीक्षण करती थीं. उन्हें रिजल्ट ओरिएंटेड ऑफिसर माना जाता था. उन्होंने सुस्त ब्यूरोक्रेसी में डेडलाइन कल्चर विकसित किया.

आराधना पटनायक (1998 बैच): स्कूली शिक्षा विभाग में रहते हुए उन्होंने साहसिक फैसला लिया, ताकि संसाधनों का सही उपयोग हो सके. उन्होंने तेजस्विनी योजना के जरिए सुदूर ग्रामीण इलाकों की किशोरियों और महिलाओं को कौशल विकास से जोड़कर उनके जीवन में बदलाव लाया. शिक्षकों की बायोमेट्रिक उपस्थिति जैसे साहसिक फैसले लेकर झारखंड की स्कूली शिक्षा की तस्वीर बदली.

अविनाश कुमार (1993 बैच): ऊर्जा विभाग में रहते हुए उन्होंने बिजली बिलिंग सिस्टम में पारदर्शिता लाई और ग्रामीण विद्युतीकरण को प्राथमिकता दी. बिजली चोरी और पुराने इंफ्रास्ट्रक्चर जैसी पुरानी समस्याओं के बीच रिन्यूएबल एनर्जी (सौर ऊर्जा) के क्षेत्र में झारखंड को आगे ले जाने वाले फैसले लिए.

डॉ डीके तिवारी (1986 बैच): राज्य में डिजिटल सुधारों और नागरिक सेवाओं को ऑनलाइन करने में इनकी सक्रियता रही. इन्होंने विस्थापन और पुनर्वास नीतियों को अधिक मानवीय और पारदर्शी बनाने पर काम किया. प्रशासनिक पेचीदगियों को सरल बनाकर आम आदमी तक लाभ पहुंचाने के लिए इन्होंने कई विभागों का कायाकल्प किया.

अजय कुमार सिंह (1995 बैच): ग्रामीण विकास और पेयजल योजनाओं के क्रियान्वयन में इनकी विशेष रुचि रही. जल जीवन मिशन को झारखंड के गांव-गांव तक पहुंचाने में इनका बड़ा योगदान है.वे फाइलों के पेचीदा नियमों को सरल बनाकर परियोजनाओं को जमीन पर उतारने के लिए जाने जाते हैं.

राहुल शर्मा (1998 बैच): झारखंड को केवल खनिजों का राज्य न मानकर इसे पर्यटन हब के रूप में ब्रांड करने का श्रेय उन्हें जाता है. नेतरहाट और पतरातू डैम का विकास उनकी दूरदर्शिता का परिणाम है.नक्सल प्रभावित इलाकों में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए स्थानीय समुदायों को जोड़कर उन्होंने इको-टूरिज्म को नई दिशा दी.

