सियासी नियुक्तियों पर लोकभवन की ‘लाल झंडी’: क्या मानकों की बलि चढ़ा रहा था सूचना आयोग, जानिए क्या है पूरी पटकथा, अब आगे क्या

Ranchi: झारखंड राज्य सूचना आयोग, जो पिछले लंबे समय से रिक्तियों की मार झेल रहा है, एक बार फिर विवादों के केंद्र...

Ranchi: झारखंड राज्य सूचना आयोग, जो पिछले लंबे समय से रिक्तियों की मार झेल रहा है, एक बार फिर विवादों के केंद्र में है. राज्यपाल ने सूचना आयुक्तों के चयन की फाइल को वापस लौटाकर सरकार की मंशा और चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. आरटीआई कार्यकर्ता सुनील कुमार महतो की शिकायत ने उस पॉलिटिकल कनेक्शन को उजागर कर दिया है, जिसे सूचना का अधिकार अधिनियम की नियमावली में स्पष्ट रूप से वर्जित माना गया है.

इस विवाद की जड़ें चयन समिति द्वारा अनुशंसित तीन प्रमुख नामों में छिपी हैं, जिसमें भाजपा के प्रदेश मीडिया प्रभारी शिवपूजन पाठक, कांग्रेस के प्रदेश महासचिव अमूल्य नीरज खालखो और झामुमो नेता तुनज खत्री के नाम शामिल हैं. राज्यपाल द्वारा फाइल लौटाने के पीछे मुख्य रूप से आरटीआई एक्ट 2005 के अध्याय 4 का हवाला दिया गया है.

कहां फंसा पेंच

आरटीआई कार्यकर्ता सुनील कुमार महतो ने अपनी लिखित आपत्ति में स्पष्ट किया है कि आरटीआई कानून के प्रावधानों के तहत सूचना आयुक्त का पद एक निष्पक्ष पद है. कानून कहता है कि पद ग्रहण करने वाला व्यक्ति किसी राजनीतिक दल से संबद्ध नहीं होना चाहिए और न ही किसी लाभ के पद पर होना चाहिए. इन नेताओं की नियुक्ति इस मानक का सीधा उल्लंघन मानी गई, जिसके कारण राज्यपाल ने फाइल पर असहमति जताई.

हाईकोर्ट की चौखट पर मामला

यह मामला केवल राजभवन तक सीमित नहीं है. सूचना आयुक्तों की नियुक्ति में हो रही देरी और प्रक्रिया की त्रुटियों को लेकर झारखंड हाई कोर्ट में भी याचिका लंबित है. कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए 13 अप्रैल 2026 की तिथि निर्धारित की है. अदालत इस बात की समीक्षा कर सकती है कि चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता के नियमों का पालन किया गया या नहीं.

अब आगे क्या ? 

नए नामों पर विचार: सरकार को इन विवादित नामों को हटाकर ऐसे चेहरों की तलाश करनी पड़ सकती है, जिनका कोई सक्रिय राजनीतिक इतिहास न हो और जो विधि, विज्ञान, समाज सेवा या पत्रकारिता जैसे क्षेत्रों के विशेषज्ञ हों.

सरकार का स्पष्टीकरण: यदि सरकार इन्हीं नामों पर अड़ी रहती है, तो उसे लोकभवन को यह संतोषजनक जवाब देना होगा कि ये नियुक्तियां वैधानिक रूप से कैसे सही हैं. हालांकि, राजनीतिक पदों पर आसीन व्यक्तियों के लिए यह डगर मुश्किल है.

हाईकोर्ट का हस्तक्षेप: 13 अप्रैल की सुनवाई में यदि सरकार कोई ठोस जवाब या क्लीन चिट पेश नहीं कर पाती है, तो कोर्ट चयन प्रक्रिया को रद्द कर नए सिरे से विज्ञापन निकालने का निर्देश दे सकता है.

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