Ranchi: झारखंड में नियम और कायदों को दरकिनार करते हुए एक ऐसे ट्रेजरी सिंडिकेट का खुलासा हुआ है, जिसने पूरी ब्यूरोक्रेसी को हिला कर रख दिया है. भ्रष्टाचार अब सरकारी तिजोरी की उन परतों तक पहुंच चुका है, जहां से राज्य के शीर्ष अधिकारियों आईएएस, आईपीएस और आईएफएस का वेतन जारी होता है. हैरानी की बात यह है कि 350 से ज्यादा आला अधिकारियों का वेतन अटक गया है, जिससे पूरे प्रशासनिक ढांचे पर सवाल खड़े हो गए हैं.
डीसी की निगरानी पर उठे सवाल, सिस्टम में गहरी सेंध
नियमतः किसी भी जिले की ट्रेजरी पर नजर रखने की जिम्मेदारी उपायुक्त की होती है, लेकिन मौजूदा हालात बताते हैं कि यह निगरानी सिर्फ कागजों तक सीमित रह गई है. जब निचले स्तर के कर्मी कथित तौर पर अवैध निकासी कर रहे थे, तब जिला प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं. इससे यह चिंता भी सामने आई है कि यदि सिस्टम की सुरक्षा ही कमजोर है, तो आम जनता के हितों की रक्षा कैसे सुनिश्चित होगी.
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पुरानी घटनाओं की याद ताजा, फिर दोहराया गया इतिहास
यह पहला मौका नहीं है जब झारखंड के वित्तीय सिस्टम पर सवाल उठे हैं. पूर्व मुख्य सचिव सुखदेव सिंह के कार्यकाल में भी अवैध निकासी का मामला सामने आया था. इस बार मामला और गंभीर माना जा रहा है, क्योंकि इसका असर सीधे ब्यूरोक्रेसी के वेतन पर पड़ा है. यह संकेत देता है कि मामला सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं, बल्कि एक संगठित तंत्र की ओर इशारा करता है.
पोर्टल बंद, फिर भी कुछ को वेतन, बढ़ा संदेह
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि एक ओर पोर्टल बंद होने की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी ओर कुछ विभागों के करीब 100 कर्मियों को समय पर वेतन मिल गया. इससे संदेह और गहरा हो गया है कि कहीं सिस्टम के भीतर ही कोई अलग रास्ता तो नहीं खोला गया था.
यह मामला अब केवल वित्तीय अनियमितता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही की बड़ी परीक्षा बन गया है.
