जेटेट पर ‘भाषाई’ संग्राम, 10 साल का इंतज़ार, और अब नियमों की रार

रांचीः झारखंड के करीब चार लाख युवाओं की आंखों में पिछले एक दशक से शिक्षक बनने का जो सपना पल रहा था,...

रांचीः झारखंड के करीब चार लाख युवाओं की आंखों में पिछले एक दशक से शिक्षक बनने का जो सपना पल रहा था, वह अब विज्ञापन के साथ हकीकत की दहलीज पर खड़ा तो है, लेकिन रास्ते में भाषाई विवाद के कांटे बिछ गए हैं. झारखंड एकेडमिक काउंसिल (जैक ) ने 28 अप्रैल से आवेदन प्रक्रिया शुरू करने का ऐलान कर दिया है, लेकिन पलामू में भोजपुरी-मगही और संताल क्षेत्र में अंगिका को लेकर छिड़ी जंग ने इस परीक्षा को केवल एक पात्रता परीक्षा न बनाकर एक राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बना दिया है.

अधर में भविष्य

10सालों का लंबा अंतराल किसी भी अभ्यर्थी के लिए मानसिक और पेशेवर रूप से थका देने वाला होता है. हजारों अभ्यर्थी ऐसे हैं जो पिछले 10 वर्षों में पात्रता परीक्षा न होने के कारण उम्र सीमा की दहलीज पार कर चुके हैं या करने वाले हैं. उनके लिए यह करो या मरो’ की स्थिति है.

तैयारी का मनोवैज्ञानिक दबाव

4 लाख परीक्षार्थियों का समूह एक लंबे समय से अनिश्चितता में जी रहा है. नियमावली पर असहमति उनके आत्मविश्वास को तोड़ती है, क्योंकि उन्हें डर है कि कहीं यह मामला फिर से कोर्ट-कचहरी के चक्कर में न फंस जाए.

क्षेत्रीय पहचान बनाम रोजगार: अभ्यर्थी इस समय दो पाटों के बीच पिसे हुए हैं. एक तरफ वे अपनी मातृभाषा (भोजपुरी, मगही, अंगिका) के लिए सम्मान चाहते हैं, तो दूसरी तरफ उन्हें डर है कि इस विवाद के कारण भर्ती प्रक्रिया और लंबी न खिंच जाए.

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क्या है विवाद का केंद्र, क्या है मांग

झारखंड के पलामू प्रमंडल में भोजपुरी और मगही को क्षेत्रीय भाषा की सूची में शामिल करने की पुरानी मांग फिर से तेज हो गई है.वहीं, संताल परगना के कुछ हिस्सों में अंगिका को लेकर मुखर आवाजें उठ रही हैं. अभ्यर्थियों का तर्क है कि यदि इन भाषाओं को प्राथमिक स्तर पर शामिल नहीं किया गया, तो इन क्षेत्रों के छात्र और शिक्षक दोनों के साथ अन्याय होगा.

प्रक्रिया के साइड इफेक्ट्स 

  • कानूनी अड़चनेः नियमावली में विसंगति रहने पर मामला हाईकोर्ट जाने की पूरी संभावना है. इससे परीक्षा की तिथि आगे बढ़ सकती है या पूरी प्रक्रिया पर स्टे लग सकता है.
  •  सामाजिक ध्रुवीकरण: भाषाई आधार पर जिलों और क्षेत्रों के बीच आपसी मतभेद बढ़ सकते हैं, जो राज्य की अखंडता और सामाजिक ताने-बाने के लिए ठीक नहीं है.
  • शिक्षकों की कमी का बरकरार रहना: राज्य के स्कूलों में शिक्षकों के हजारों पद रिक्त हैं. विवाद के कारण अगर परीक्षा टलती है, तो सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था और भी जर्जर हो जाएगी.
  • प्रतिभा पलायन: निराश होकर योग्य अभ्यर्थी अन्य राज्यों या निजी क्षेत्रों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे झारखंड अपने बेहतरीन शिक्षकों को खो रहा है.
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