Ranchi: विश्व कार्यस्थल सुरक्षा एवं स्वास्थ्य दिवस आज यानी 28 अप्रैल को मनाया जा रहा है. कामकाजी महिलाओं की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के मामले तो बढ़ रहे हैं, लेकिन लोकलाज और कानून की जानकारी न होने के कारण शिकायतें दर्ज नहीं हो पा रही हैं.
प्रमुख आंकड़े और चौंकाने वाले तथ्य
एसोसिएशन फॉर एडवोकेसी एंड लीगल इनिशिएटिव’ (आली) द्वारा राज्य के 15 जिलों में किए गए एक सर्वे में 138 महिलाओं को शामिल किया गया. इसके निष्कर्ष चिंताजनक हैं. 46% महिलाओं ने स्वीकार किया कि उनके साथ कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न हुआ है. 52% महिलाओं ने इसे उत्पीड़न मानने से ही इनकार कर दिया और इसे काम का हिस्सा मानकर नजरअंदाज कर दिया. केवल दो महिलाओं ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जबकि 29 महिलाओं ने उत्पीड़न के बावजूद चुप्पी साधे रखी.
क्या है पॉश एक्ट 2013 ?
यह कानून कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न को रोकने, निषेध करने और निवारण के उद्देश्य से बनाया गया है. इसका मुख्य लक्ष्य महिलाओं को एक सुरक्षित कार्य वातावरण प्रदान करना है.
यौन उत्पीड़न के दायरे में क्या आता है ?
– अनचाहा शारीरिक संपर्क या इशारा.
– अश्लील टिप्पणियां करना या अश्लील फोटो और वीडियो दिखाना.
– यौन संबंध के लिए दबाव बनाना.
– नौकरी या प्रमोशन के बदले अनुचित शर्तें रखना.
– सिस्टम की विफलता: समितियां निष्क्रिय
कानून के अनुसार हर संस्थान में ‘आंतरिक शिकायत समिति (ICC) का होना अनिवार्य है, लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है. झारखंड के 24 में से केवल 14 जिलों से ही स्थानीय समितियों का आंकड़ा प्राप्त हुआ. केवल सात जिलों में आंतरिक समितियां सक्रिय पाई गई.
जागरूकता और प्रशिक्षण की कमी
सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद संस्थानों में इस कानून का प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हो रहा है. रिपोर्ट में बताया गया है कि महिलाओं को यह पता ही नहीं है कि उनके साथ हुआ व्यवहार कानूनी अपराध है. ग्रामीण क्षेत्रों में महिला श्रम भागीदारी दर 23.4% है, लेकिन वहां तक कानून की जानकारी बिल्कुल नहीं पहुंच रही है. रांची और बोकारो जैसी जगहों से आए बयानों में महिलाओं ने बताया कि वे लोक-लाज और नौकरी खोने के डर से चुप रहीं.
