Ajay Dayal
Ranchi: जब जिंदगी दर्द से कराह रही हो और हर दरवाजा बंद नजर आए, तब अगर कोई हाथ थाम ले, वही असली उम्मीद बन जाता है। गोंदलीपोखर के 50 वर्षीय जयप्रकाश सिंह मुंडा की कहानी ऐसी ही इंसानियत की मिसाल है, जहां अपनों और व्यवस्था ने मुंह मोड़ा, लेकिन समाज ने फरिश्ता बनकर उन्हें सहारा दिया.
बचपन से ही संघर्षों की छाया:
जयप्रकाश का जीवन शुरू से ही कठिनाइयों से घिरा रहा. बचपन में ही माता-पिता का साया उठ गया और रिश्तेदारों ने भी साथ छोड़ दिया. रांची की सड़कों पर भटकते हुए आखिरकार उन्हें गोंदलीपोखर में पनाह मिली. यहीं के ग्रामीण उनके लिए परिवार बन गए, लेकिन जिंदगी उन्होंने अकेले ही काटी.
हादसा बना नई मुसीबत:
करीब 15 दिन पहले हुए सड़क हादसे ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दीं. हादसे में उनका एक पैर बुरी तरह टूट गया. स्थानीय लोगों ने मानवता दिखाते हुए उन्हें इलाज के लिए राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) भेजा, लेकिन वहां से निराशा ही हाथ लगी.
अस्पताल ने छोड़ा साथ:
बताया जाता है कि अस्पताल में किसी परिजन के साथ नहीं होने की वजह से उनका इलाज रोक दिया गया. दर्द से कराहते जयप्रकाश को बिना इलाज के ही वापस गांव लौटना पड़ा. यह घटना सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है.
समाजसेवियों ने बढ़ाया हाथ:
गुरुवार को जब समाजसेवी रामपोदो महतो और नीलकंठ चौधरी को इस घटना की जानकारी मिली, तो वे तुरंत मदद के लिए आगे आए. उन्होंने जयप्रकाश को निजी अस्पताल ले जाकर एक्स-रे कराया और इलाज की पहल शुरू की.
अब बंगाल में इलाज की तैयारी:
जांच के बाद पता चला कि पैर का ऑपरेशन जरूरी है। हालांकि, समाजसेवियों ने पश्चिम बंगाल के एक आयुर्वेदिक चिकित्सक से संपर्क किया है, जो बिना ऑपरेशन के हड्डी जोड़ने का दावा करते हैं. अब जयप्रकाश को शनिवार या रविवार को इलाज के लिए बंगाल ले जाने की तैयारी की जा रही है.
इंसानियत अभी जिंदा है:
यह कहानी एक ओर जहां सिस्टम की संवेदनहीनता को उजागर करती है, वहीं दूसरी ओर यह भी साबित करती है कि समाज में मानवता की लौ अब भी जल रही है.जब अपने साथ छोड़ दें, तब समाज ही असली सहारा बनता है.
