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इतिहास और आस्था की भूमि ईचागढ़ में हाथी-मानव संघर्ष बना संकट, बेघर होने की कगार पर ग्रामीण

Saraikela: सरायकेला-खरसावां जिले का ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र अपनी ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत के लिए जाना जाता है. स्वर्णरेखा नदी के तट पर...

Dalma
दलमा सेंचुरी

Saraikela: सरायकेला-खरसावां जिले का ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र अपनी ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत के लिए जाना जाता है. स्वर्णरेखा नदी के तट पर बसा यह क्षेत्र विक्रमादित्यदेव के शासनकाल से जुड़े प्राचीन शिव मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है. जयदा शिव मंदिर, ईचागढ़ का घोलटा शिव मंदिर और कोयलागढ़ शिव धाम का पांच मुखी शिव मंदिर यहां की आस्था के प्रमुख केंद्र हैं. यहीं दलमा वाइल्ड लाइफ सेंचुरी की बीहड़ों से होते हुए दलमा की चोटी पर विराजमान हैं दलमा बूढ़ा बाबा. साथ ही बहुउद्देशीय परियोजना से बना चांडिल डैम जलाशय भी इसी क्षेत्र में 22 हजार हेक्टेयर में फैला हुआ है. लेकिन आज यह समृद्ध विरासत वाला क्षेत्र गंभीर हाथी-मानव संघर्ष से जूझ रहा है.

हाथी गांवों की ओर कर रहे रुख

दलमा सेंचुरी से पलायन कर विशाल हाथियों का झुंड भोजन-पानी की तलाश में ईचागढ़ विधानसभा क्षेत्र के गांवों में डेरा डाले हुए है. शाम ढलते ही गजराजों का झुंड गांव में प्रवेश कर जाता है. फसलें रौंद देता है, घर तोड़ देता है. जंगल में भोजन और पानी पर्याप्त उपलब्ध नहीं होने के कारण हाथी गांवों की ओर रुख कर रहे हैं.

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बेघर होने की कगार पर किसान

चांडिल अनुमंडल क्षेत्र के सुदूरवर्ती गांवों के किसान परिवार बेघर होने की कगार पर हैं. ग्रामीण अब दिन में भी गांव आने से डरते हैं. मन में सवाल उठता है, कि कहीं रास्ते में हाथी का झुंड मौत बनकर खड़ा न हो. रात में सोने से हिचकिचाते हैं कि कहीं हाथी आंगन में न आ जाए.

हालात ऐसे हैं कि कई परिवार डर के कारण गांव छोड़कर शहरी क्षेत्रों में रहने को मजबूर हो गए हैं. खेत खलिहान वीरान पड़े हैं. बच्चों की पढ़ाई छूट रही है. ग्रामीणों का कहना है कि वन विभाग की एलिफेंट ड्राइव टीम समय पर नहीं पहुंचती. सोलर फेंसिंग और ट्रेंच की व्यवस्था नहीं है.

कारण क्या?

विशेषज्ञों के मुताबिक दलमा कॉरिडोर में अवैध बालू खनन, जंगलों की कटाई और चांडिल डैम के बैकवाटर से पारंपरिक रास्ते बाधित होने से हाथी भटक कर रिहायशी इलाकों में आ रहे हैं. ग्रामीणों ने सरकार से स्थायी समाधान की मांग की है. उनका कहना है कि यदि जल्द ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो ईचागढ़ की यह ऐतिहासिक धरती वीरान हो जाएगी.

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