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अब पहाड़ और नदियों को बचाने की लड़ाई, जमशेदपुर से उठेगी देशव्यापी आवाज

Jamshedpur: देश की नदियां सूख रही हैं, पहाड़ टूट रहे हैं और प्रकृति का संतुलन लगातार बिगड़ता जा रहा है. झारखंड समेत...

Jamshedpur: देश की नदियां सूख रही हैं, पहाड़ टूट रहे हैं और प्रकृति का संतुलन लगातार बिगड़ता जा रहा है. झारखंड समेत पूरे देश में बढ़ते खनन, अतिक्रमण और अनियोजित विकास के बीच अब पहाड़ों और नदियों को बचाने के लिए मजबूत कानून बनाने की मांग तेज हो गई है. इसी मुद्दे पर 22 और 23 मई को जमशेदपुर के मोतीलाल नेहरू पब्लिक स्कूल सभागार में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित होगी.

प्राकृतिक धरोहर सबसे बड़े संकट में

जमशेदपुर में आयोजित संगोष्ठी के संयोजक दिनेश मिश्र ने कहा कि आज देश की प्राकृतिक धरोहर सबसे बड़े संकट से गुजर रही है. जिन पहाड़ों से नदियां निकलती हैं, वही पहाड़ खनन और अतिक्रमण की मार झेल रहे हैं. नदियां लगातार सिकुड़ रही हैं, प्रदूषित हो रही हैं और कई जगहों पर नालों में बदलती जा रही हैं. उन्होंने कहा कि दुखद बात यह है कि देश में अब तक पहाड़ों और नदियों की सुरक्षा के लिए कोई अलग और सख्त कानून नहीं बन पाया है.

पहाड़ों और नदियों के लिए अलग कानून की मांग

यह संगोष्ठी देश के प्रसिद्ध जल विशेषज्ञ राजेंद्र सिंह और विधायक सरयू राय के संरक्षण में आयोजित की जा रही है. इसमें देशभर से पर्यावरणविद, वैज्ञानिक, सामाजिक कार्यकर्ता और नीति विशेषज्ञ भाग लेंगे. कार्यक्रम में पहाड़ों और नदियों की सुरक्षा के लिए अलग-अलग कानूनों का प्रारूप तैयार किया जाएगा, जिसे बाद में भारत सरकार को सौंपा जाएगा.

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कानून का प्रारूप तैयार कर सरकार को सौंपा जाएगा

संगोष्ठी में यह चिंता जताई गई कि हिमालय, अरावली, पश्चिमी घाट, सतपुड़ा और विंध्य जैसी पर्वत श्रृंखलाएं आज अंधाधुंध खनन, जंगल कटाई और बड़े निर्माण कार्यों के कारण खतरे में हैं. वहीं दूसरी ओर नदियों का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हो रहा है, जलस्रोत खत्म हो रहे हैं और जल संकट लगातार गहराता जा रहा है. प्रस्तावित कानून में पहाड़ी क्षेत्रों में बड़े खनन, अवैध उत्खनन, जंगल कटाई और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली परियोजनाओं पर सख्त नियंत्रण की बात कही गई है. साथ ही स्थानीय समुदायों, आदिवासियों और ग्रामीणों की भागीदारी सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया गया है. 

हिमालय से विंध्य तक खतरे की चेतावनी

नदियों को लेकर तैयार प्रस्ताव में कहा गया है कि नदियां केवल जलधारा नहीं, बल्कि जीवन, संस्कृति और सभ्यता की पहचान हैं. यदि नदियां खत्म होती हैं तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी संकट में पड़ जाएगा. इसलिए नदियों को प्रदूषण, अतिक्रमण और अत्यधिक दोहन से बचाने के लिए सख्त कानून समय की सबसे बड़ी जरूरत बन चुका है.

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