Hazaribagh: झारखंड की प्राकृतिक संपदा को सहेजने और ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए राज्य सरकार ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कवायद तेज कर दी है. बुधवार को जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी (जाइका) की आठ सदस्यीय टीम मांडू पहुंची. टीम ने अगले दस वर्षों तक चलने वाली इस विशेष परियोजना के तहत वनों के संरक्षण और वनोपज आधारित जीविकोपार्जन पर विस्तृत चर्चा की.
ग्रामीणों से मांगा गया सुझाव
मांडू स्थित वन क्षेत्र पदाधिकारी कार्यालय में आयोजित संयुक्त बैठक में जाइका के विशेषज्ञों ने ग्रामीणों और वन समितियों के साथ सीधा संवाद किया. बैठक का मुख्य उद्देश्य कोल माइंस क्षेत्र के समीप स्थित जंगलों का बचाव और वहां रहने वाले ग्रामीणों के लिए आय के स्थायी स्रोत विकसित करना था. विचार-विमर्श के दौरान ग्रामीणों ने मांग रखी कि जंगलों में आंवला, बहेरा, त्रिफला और महुआ जैसे लाभदायक पौधों का बड़े पैमाने पर रोपण किया जाए, ताकि भविष्य में उन्हें बेहतर बाजार और आय मिल सके.

महुआ उत्पाद व प्रबंधन समिति पर जोर
कुजू पूर्वी पंचायत स्थित सरना स्थल पर आयोजित एक अन्य बैठक में टीम ने वन संपदा के वैज्ञानिक प्रबंधन पर जोर दिया. विशेषज्ञों ने कहा की महुआ, कोड़ी और अन्य वन उत्पादों का सही ढंग से संग्रहण और विपणन (मार्केटिंग) किया जाए, तो यह ग्रामीणों की तकदीर बदल सकता है. इस दौरान उत्पादों के सुरक्षित भंडारण के लिए आधुनिक गोदाम निर्माण की आवश्यकता पर भी चर्चा हुई.
निष्क्रिय समितियां होंगी पुनर्जीवित
वन प्रमंडल पदाधिकारी नितेश कुमार ने इस अवसर पर कहा कि वनों की सुरक्षा तभी संभव है, जब स्थानीय ग्रामीण इसमें सक्रिय भागीदारी निभाएं. उन्होंने पुरानी और निष्क्रिय पड़ी वन समितियों को पुनः सक्रिय करने के लिए महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए. उन्होंने जोर देकर कहा कि पर्यावरण संतुलन और सुरक्षित भविष्य के लिए वनों का विस्तार अनिवार्य है.
कार्यक्रम में मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय दौरे में जाइका टीम की ओर से डॉ. माइका इबातो, महदा कैची, तायय नकानिशि और मतसुई नावहिरो शामिल थे. वहीं विभाग की ओर से रेंजर बटेश्वर पासवान, वनपाल सुनील कुमार, शैलेंद्र कुमार सहित भारी संख्या में ग्रामीण और वनरक्षी उपस्थित थे.
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