धनबाद: धनबाद के नवनिर्वाचित मेयर संजीव सिंह करीब आठ साल जेल की सलाखों के पीछे बिताने के बाद, बाहर आने के महज छह महीने के भीतर संजीव सिंह ने न केवल अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पा ली है. बल्कि वे धनबाद की राजनीति के एक चमकते सितारे बनकर उभरे हैं.

विरासत का दम नाम ही काफी है:
झरिया के कद्दावर नेता रहे स्व. सूरजदेव सिंह की विरासत को संजीव ने नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है. सूरजदेव सिंह के निधन के चार दशक बाद भी उनका प्रभाव धनबाद से लेकर उत्तर प्रदेश के बलिया तक कायम है. सिंह मेंशन का दबदबा इस बात से समझा जा सकता है कि परिवार के सदस्य बच्चा सिंह, विक्रमा सिंह, कुंती देवी और स्वयं संजीव सिंह विधायक रह चुके हैं. रामधीर सिंह जिला परिषद अध्यक्ष और इंदू देवी मेयर रह चुकी हैं.अब संजीव सिंह ने खुद मेयर बनकर इस सिलसिले को नई मजबूती दी है.
8 साल का कड़ा संघर्ष और कानूनी लड़ाई:
संजीव सिंह के जीवन का सबसे कठिन दौर 2017 में शुरू हुआ. 2014 में भाजपा के टिकट पर विधायक चुने गए संजीव पर अपने चचेरे भाई और पूर्व डिप्टी मेयर नीरज सिंह की हत्या का आरोप लगा. खुद को बेगुनाह बताते हुए संजीव ने धनबाद थाने में सरेंडर किया था. करीब आठ साल तक वे धनबाद, दुमका और रांची की जेलों में रहे. खराब स्वास्थ्य के कारण उन्हें रिम्स में भी लंबा समय बिताना पड़ा. 27 अगस्त 2025 को अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया, जिसके बाद उनकी सक्रिय राजनीति में वापसी का रास्ता साफ हुआ.
रागिनी सिंह की जीत और सिंह मेंशन की वापसी:
संजीव सिंह की अनुपस्थिति में सिंह मेंशन को 2019 के विधानसभा चुनाव में बड़ा झटका लगा था, जब उनकी पत्नी रागिनी सिंह कांग्रेस प्रत्याशी पूर्णिमा नीरज सिंह से चुनाव हार गई थीं. हालांकि, 2024 के चुनाव में रागिनी सिंह ने जोरदार वापसी की और पूर्णिमा नीरज सिंह को शिकस्त देकर झरिया सीट वापस सिंह मेंशन की झोली में डाल दी। इस जीत ने परिवार के राजनीतिक वनवास को खत्म करने की नींव रखी.

