चुनावी बिगुल बजने के बाद भी खाली पड़ा है रिटर्निंग ऑफिसर का दफ्तर, बंद कमरों में कैलकुलेटर पर चल रही सियासी जंग

Ravi Bharti Ranchi: सूना-सूना है जहां, अब जाऊं मैं कहां… झारखंड विधानसभा स्थित निर्वाचन अधिकारी (आरओ) रंजीत कुमार के दफ्तर के बाहर...

Ravi Bharti

Ranchi: सूना-सूना है जहां, अब जाऊं मैं कहां… झारखंड विधानसभा स्थित निर्वाचन अधिकारी (आरओ) रंजीत कुमार के दफ्तर के बाहर इन दिनों यही पुराना फिल्मी नगमा बैकग्राउंड म्यूजिक की तरह गूंज रहा है. चुनाव आयोग ने बिगुल फूंक दिया, अधिसूचना जारी हो गई, और प्रभारी सचिव ने बकायदा फॉर्म 1 का नोटिस टांग कर लाल कालीन भी बिछा दिया. उम्मीद थी कि माननीयों और महामाननीयों का हुजूम उमड़ेगा, पर आलम यह है कि नामांकन काउंटर पर ऐसा सन्नाटा पसरा है कि अगर वहां कोई सुई भी गिर जाए, तो उसकी आवाज से सुरक्षाकर्मी चौंक जाएं. दूसरे दिन भी काउंटर पर नो एंट्री जैसा माहौल रहा. न तो किसी स्थापित दल के रथी-महारथी ने कदम रखा और ना ही किसी निर्दलीय सूरमा ने पर्चा खरीदने की जहमत उठाई. सच तो यह है कि यह उस तूफान के पहले की शांति है, जिसकी स्क्रिप्ट बंद कमरों में गुणा-गणित और जोड़-तोड़ के कैलकुलेटर पर लिखी जा रही है.

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प्रस्तावक का दहाई का आंकड़ा और निर्दलीयों की लो-बीपी

इस बार के चुनावी नियमों ने सबसे तगड़ा झटका उन महत्वाकांक्षी चेहरों को दिया है, जो निर्दलीय झंडा उठाकर संसद के उच्च सदन पहुंचने का ख्वाब देख रहे थे. नियमों के मुताबिक, यदि आप किसी मान्यता प्राप्त दल के सिपाही हैं, तो आपको नौ विधायकों का लिखित समर्थन और प्रस्तावक चाहिए. लेकिन निर्दलीय उम्मीदवारों के आगे खड़ा किया गया है. उन्हें विधानसभा के भीतर से कम से कम 10 विधायकों को प्रस्तावक बनाना अनिवार्य है. सियासी गलियारों में चर्चा आम है कि कई निर्दलीय सूरमा तो 10 विधायकों की लिस्ट बनाने के लिए प्रस्तावक लोन योजना तलाश रहे हैं.

सुरक्षा राशि की सस्ती राह, मगर समर्थन का महंगा सफर

चुनाव आयोग ने नामांकन पत्र हासिल करने का समय सुबह 11 बजे से दोपहर 3 बजे तक तय किया है. जेब के लिहाज से देखें तो एंट्री फीस बेहद किफायती रखी गई है. सामान्य वर्ग के लिए 10 हजार रुपये और अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए मात्र 5 हजार रुपये की सुरक्षा राशि तय है. फॉर्म की कीमत भले ही चंद हजार हो, लेकिन उसे वैध बनाने के लिए जो 10 विधायकों का प्रीमियम चुकाना पड़ रहा है.

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हर दल नाप रहा है कि कितने सरप्लस हैं वोट

फिलहाल हर दल यह नाप रहा है कि उसके पास कितने सरप्लस वोट हैं और विरोधी के पाले में कितनी सेंधमारी की जा सकती है. यह सन्नाटा दरअसल रणनीतिक है. कोई भी दल पहले पत्ता खोलकर अपने विरोधियों को संभलने का मौका नहीं देना चाहता. सब वेट एंड वॉच की मुद्रा में हैं. देखना दिलचस्प होगा कि दस का दम दिखाने के चक्कर में कितने निर्दलीय मैदान छोड़ते हैं और कौन सा धुरंधर इस सूने पड़े काउंटर की खामोशी को सबसे पहले तोड़ता है.

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