
Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट फिलहाल जजों की भारी कमी से जूझ रहा है. हाईकोर्ट में जजों के कुल स्वीकृत पदों की संख्या 25 है लेकिन वर्तमान में मुख्य न्यायाधीश समेत केवल 13 जज ही कार्यरत हैं. इसका सीधा मतलब यह है कि हाईकोर्ट लगभग 50 प्रतिशत क्षमता के साथ काम करने को मजबूर है और जजों के 12 पद खाली पड़े हैं. राज्य में मुकदमों के त्वरित निपटारे और आम जनता को समय पर न्याय देने के दावों के बीच एक चौंकाने वाली स्थिति सामने आई है.
अदालत की कार्यप्रणाली पर असर
जजों की इस भारी कमी के कारण अदालत में लंबित मामलों का ग्राफ तेजी से बढ़ सकता है क्योंकि एक-एक जज पर मुकदमों का बोझ बढ़ चूका है. झारखंड हाईकोर्ट में 6 सिंगल बेंच 3 डबल बेंच कार्यरत हैं, जजों की कम संख्या के कारण हाईकोर्ट में दायर होने वाली क्रिमिनल अपील, जमानत याचिकाएं और सिविल मामलों के निपटारे में अधिक समय लग रहा है.
सेवानिवृत्ति से गहराया संकट
पिछले कुछ समय में कुछ जजों की सेवानिवृत्ति के बाद यह संकट और गहरा गया है. विधि विशेषज्ञों और बार एसोसिएशन का मानना है कि केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को प्राथमिकता के आधार पर झारखंड हाईकोर्ट के लिए नए नामों को मंजूरी देनी चाहिए. जस्टिस अम्बुज नाथ और जस्टिस गौतम चौधरी इसी इसी वर्ष रिटायर हुए हैं इस पहले जस्टिस डॉ एस एन पाठक रिटायर हुए थे, जस्टिस नवनीत कुमार भी रिटायर हो गए. जस्टिस सुभाष चांद और जस्टिस रत्नाकर भेंगरा भी सेवानिवृति हो चुके हैं.
वकीलों और विशेषज्ञों की राय
हाईकोर्ट के अधिवक्ता धीरज कुमार बताते हैं कि सिर्फ 13 सीटिंग जजों की कोर्ट में सुनवाई होने के कारण कई मुकदमों की सुनवाई जल्द नहीं हो पा रही है. जजों की कमी की वजह से लंबित मामले सुनवाई के लिए सूचीबद्ध नहीं हो पा रहे और जिन न्यायालयों में केस लिस्ट हो रहे हैं वहां केस की संख्या ज्यादा हो गई है जिसके कारण केस लिस्ट होने के बाद भी उसकी हियरिंग नहीं हो रही है.
