News Wave Exclusive: झारखंड के जंगलों की इकोनॉमिक वैल्यू मापेगी सरकार, सिर्फ लकड़ी-कोयला नहीं, सांसों की कीमत और पर्यावरण सुरक्षा का भी लगेगा हिसाब

Ranchi: अब तक जंगलों के योगदान को सिर्फ लकड़ी, वनोपज या राजस्व के चश्मे से देखा जाता रहा है, लेकिन अब झारखंड...

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Ranchi: अब तक जंगलों के योगदान को सिर्फ लकड़ी, वनोपज या राजस्व के चश्मे से देखा जाता रहा है, लेकिन अब झारखंड सरकार इसके वास्तविक और अदृश्य मूल्य का वैज्ञानिक हिसाब लगाने जा रही है. झारखंड कंपनसेटरी एफॉरेस्टेशन फंड मैनेजमेंट एंड प्लानिंग अथॉरिटी  ने एक बेहद महत्वाकांक्षी और ऐतिहासिक परियोजना का खाका तैयार किया है. इस प्रोजेक्ट का नाम ‘एसेसमेंट ऑफ इकोसिस्टम सर्विसेज प्रोवाइडेड बाई फॉरेस्ट इकोसिस्टम इन झारखंड स्टेट फॉर इकोसिस्टम एंड ह्यूमन वेल बीइंग’ है. इसके तहत राज्य के जंगलों से मिलने वाले प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष फायदों (इकोसिस्टम सर्विसेज) का न केवल वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाएगा, बल्कि उनका एक सांकेतिक आर्थिक मूल्य भी तय किया जाएगा ताकि इसे भविष्य की सरकारी नीतियों और बजट निर्माण का हिस्सा बनाया जा सके.

क्यों पड़ी इसकी जरूरत 

मौजूदा समय में बाजार व्यवस्था केवल उन्हीं चीजों की कीमत समझती है जो बिक सकती हैं, जैसे लकड़ी या बांस. लेकिन जंगल जो मुफ्त में साफ हवा (ऑक्सीजन), जल शुद्धिकरण, कार्बन सोखने की क्षमता और बाढ़-सूखे से सुरक्षा देते हैं, उनकी कोई आर्थिक गणना सरकारी फाइलों में नहीं होती. इस प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य जंगलों के इसी ‘अदृश्य योगदान’ को सामने लाना है ताकि विकास योजनाओं को बनाते समय पर्यावरण को होने वाले नुकसान और फायदों का सही आकलन हो सके. हालांकि, सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जीवन के लिए अनिवार्य तत्वों (जैसे शुद्ध हवा, पानी) और आदिवासियों की सांस्कृतिक-आध्यात्मिक आस्था को पूरी तरह पैसों में नहीं तोला जा सकता. इसलिए यह मूल्यांकन वास्तविक बाजार मूल्य के बजाय उनके ‘सापेक्षिक महत्व’ को दर्शाएगा.

चार बड़े पैमानों पर होगा जंगलों का मूल्यांकन

  1. प्रोविजनिंग सर्विसेज (उत्पादक सेवाएं): इसके तहत जंगलों से मिलने वाली लकड़ी, जलावन, भोजन, शुद्ध पानी और औषधीय पौधों की उपलब्धता का आकलन होगा.
  2. रेगुलेटिंग सर्विसेज (नियामक सेवाएं): जंगल किस प्रकार जलवायु को नियंत्रित कर रहे हैं, कितना कार्बन सोख रहे हैं (कार्बन सीक्वेस्ट्रेशन), पानी को कैसे साफ कर रहे हैं और बाढ़-सूखे को कैसे रोक रहे हैं, इसका वैज्ञानिक डेटा तैयार होगा.
  3. सपोर्टिंग सर्विसेज (सहायक सेवाएं): मिट्टी के निर्माण (सॉइल फॉर्मेशन), पोषक तत्वों के चक्र (न्यूट्रिएंट साइकिलिंग) और जैव विविधता (बायोडायवर्सिटी) को बचाए रखने में जंगलों की भूमिका की जांच होगी.
  4. कल्चरल सर्विसेज (सांस्कृतिक सेवाएं): पर्यटन, आध्यात्मिक महत्व और स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान व सांस्कृतिक विरासत का मूल्यांकन किया जाएगा.

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इन बिंदुओ पर होगा काम

  • स्थानीय लोगों की खाद्य सुरक्षा, पोषण, रोजगार और आय के लिए जंगलों पर निर्भरता.
  • पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों और सांस्कृतिक पहचान में वनों का योगदान.
  • जंगलों के कटने या उनके खराब  होने से इंसानी जीवन पर पड़ने वाले आर्थिक, शारीरिक और सामाजिक दुष्प्रभाव.
  • जलवायु परिवर्तन और आपदा प्रबंधन की बनेगी रणनीति
  • बदलते मौसम चक्र को देखते हुए यह प्रोजेक्ट झारखंड को पर्यावरण संकट से बचाने का ब्लूप्रिंट बनेगा.
  • ग्लोबल वार्मिंग से निपटने में झारखंड के जंगलों की भूमिका और उन पर जलवायु परिवर्तन के संभावित खतरों का आकलन होगा.
  • मिट्टी के कटाव, भूस्खलन, मरुस्थलीकरण और सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाओं को रोकने में वनों की क्षमता मापी जाएगी.
  • पारिस्थितिक तंत्र में आ रही गिरावट को समय रहते पकड़ने के लिए ‘अर्ली वार्निंग इंडिकेटर्स’ (प्रारंभिक चेतावनी संकेतक) विकसित किए जाएंगे.

नीति निर्धारण और वैश्विक प्रतिबद्धताओं से जुड़ाव

इस पूरे अध्ययन का अंतिम लक्ष्य वन विभाग की कार्यप्रणाली को आधुनिक बनाना है. वनों की सेहत, वनों की कटाई के ट्रेंड और वन्यजीव कॉरिडोर (जैसे बाघ व अन्य जीवों के गलियारे) के संरक्षण के लिए इस डेटा का उपयोग किया जाएगा. इसके अलावा, इस रिपोर्ट के सुझावों को राज्य की भूमि-उपयोग नीतियों, विकास योजनाओं और बजट आवंटन के ढांचे में शामिल किया जाएगा. यह पूरा फ्रेमवर्क संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों  और वैश्विक जैव विविधता अभिसमय  के अनुरूप होगा.

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