झारखंड का राज्यसभा संग्राम: लोकल-वोकल की जंग के बीच पेचीदा वोटिंग का वो गणित जिसने दिल्ली तक बढ़ाई धड़कनें

Ranchi: झारखंड के संसदीय इतिहास में राज्यसभा की दो सीटों के लिए होने जा रहा आगामी चुनाव महज एक रूटीन वोटिंग नहीं,...

Ranchi: झारखंड के संसदीय इतिहास में राज्यसभा की दो सीटों के लिए होने जा रहा आगामी चुनाव महज एक रूटीन वोटिंग नहीं, बल्कि राजनीतिक वजूद, साख और गणितीय तिकड़मों का सबसे बड़ा अखाड़ा बनने जा रहा है. अमूमन दो सीटों पर दो ही उम्मीदवार होने से चुनावी शोर शांत रहता है और प्रत्याशी निर्विरोध चुन लिए जाते हैं, लेकिन इस बार हवा का रुख पूरी तरह बदला हुआ है. झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने दोनों सीटों पर, जबकि कांग्रेस और भाजपा ने एक-एक सीट पर अपना-अपना दावा ठोक कर मुकाबले को त्रिकोणीय और चतुष्कोणीय बना दिया है.

दिलचस्प है यह मुकाबला

यह मुकाबला इसलिए दिलचस्प है क्योंकि जब सीटों की संख्या से अधिक दावेदार मैदान में हों, तो सीधे बहुमत का नियम काम नहीं आता. यहां एंट्री होती है एकल संक्रमणीय मत पद्धति की, जहां विधायक का सिर्फ एक वोट नहीं गिना जाता, बल्कि उसकी पहली, दूसरी और तीसरी पसंद (वरीयता) हार और जीत का फैसला करती है. इस पेचीदे गणित के बीच एक कड़वी हकीकत यह भी है कि झारखंड की सियासत में बाहरी बनाम स्थानीय और विधायक रहते हुए दिल्ली न पहुंच पाने का एक अजीब रिकॉर्ड रहा है, जो इस बार के रण को और अधिक आक्रामक बना रहा है.

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वोट वैल्यू का खेल: 28 का वो ‘जादुई आंकड़ा’ जो तय करेगा किंगमेकर

झारखंड विधानसभा में वर्तमान में कुल निर्वाचित विधायकों की संख्या 81 है. राज्यसभा चुनाव के कड़े नियमों के अनुसार, किसी भी उम्मीदवार को पहली ही बार में सुरक्षित जीत दर्ज करने के लिए एक विशेष ‘कोटा’ हासिल करना होता है. इस कोटे को तय करने का एक तय फॉर्मूला है. कुल विधायकों की संख्या (81) को खाली सीटों की संख्या + 1 (यानी 2 + 1 = 3) से भाग दिया जाता है. इस गणित से संख्या आती है 27. फिर नियम के मुताबिक इसमें 1 अंक और जोड़ दिया जाता है. यानी 28 की संख्या वह जादुई चाबी है, जो किसी भी प्रत्याशी को सीधे राज्यसभा की दहलीज पार करा देगी. जिस उम्मीदवार को पहली वरीयता के न्यूनतम 28 वोट मिल जाएंगे, उसकी सीट पक्की हो जाएगी.

सरप्लस वोटों का मूल्य और दूसरी पसंद का उलटफेर

इस चुनाव में सबसे बड़ा रोमांच तब पैदा होता है, जब किसी बड़े दल के उम्मीदवार को तय कोटे से अधिक वोट मिल जाते हैं. इस प्रणाली में उन अतिरिक्त यानी सरप्लस वोटों को बेकार नहीं फेंका जाता. यहां हर एक विधायक के वोट का मूल मूल्य 100 अंक माना जाता है. अगर किसी उम्मीदवार ‘ए’ को पहली वरीयता के 30 मत मिल जाते हैं, तो उसे जीत के लिए जरूरी 28 मतों से 2 वोट अधिक मिले. अब इन अतिरिक्त वोटों को दूसरी वरीयता के आधार पर बचे हुए उम्मीदवारों में ट्रांसफर कर दिया जाएगा.

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चौथे खिलाड़ी की एंट्री और ‘एलिमिनेशन राउंड’ का डर

यदि इस सियासी खेल में ‘डी’ के रूप में कोई चौथा उम्मीदवार भी डटा रहता है और उसे सबसे कम यानी केवल 6 पहली वरीयता के मत (वैल्यू 600) मिलते हैं, तो वह रेस से बाहर हो जाएगा. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती. ‘डी’ के बाहर होने के बाद उसे वोट देने वाले सभी 6 विधायकों की दूसरी पसंद की पर्चियां जांची जाएंगी. उन 6 विधायकों ने दूसरी पसंद के रूप में जिसे भी चुना होगा, वे वोट उन बचे हुए उम्मीदवारों के खाते में ट्रांसफर हो जाएंगे. यही वजह है कि इस त्रिकोणीय या चतुष्कोणीय मुकाबले में हर एक विधायक की दूसरी और तीसरी पसंद की अहमियत सोने से भी ज्यादा कीमती हो गई है.

विधायक रहते हुए आज तक कोई नहीं पहुंचा राज्यसभा

इस चुनाव के बीच झारखंड की सियासत का एक ऐसा पन्ना भी सामने आया है जो हैरान करने वाला है. साल 2025 तक झारखंड से राज्यसभा के अलग-अलग स्थानों को भरने के लिए कुल 19 बार चुनाव हुए, जिनमें 7 उपचुनाव और 12 दो-वर्षीय चुनाव शामिल हैं. इस लंबे कालखंड में कभी भी झारखंड विधानसभा का चालू सदस्य (विधायक) रहते हुए कोई भी नेता सीधे राज्यसभा नहीं भेजा गया, यहां तक कि किसी को प्रत्याशी तक नहीं बनाया गया. ऐसा नहीं था कि राजनीतिक दलों के पास इसके लिए संख्या बल की कमी थी. आंकड़ों पर नजर डालें तो भाजपा के पास पहली विधानसभा में 33, दूसरी में 31 और चौथी विधानसभा में 43 सदस्य थे. तीसरी विधानसभा के दौरान गठबंधन के रूप में सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों के पास 28 से अधिक की मजबूत संख्या थी. पांचवीं विधानसभा में झामुमो के पास 28 सदस्य थे, और वर्तमान छठी विधानसभा में यह आंकड़ा 34 सदस्यों का है. इसके बावजूद, कभी किसी सिटिंग विधायक पर दांव नहीं खेला गया. झारखंड के इतिहास में शिबू सोरेन (दो बार), स्टीफेन मरांडी, हेमंत सोरेन, प्रदीप कुमार बलमुचु और सरफराज अहमद जैसे दिग्गज जब भी राज्यसभा पहुंचे, तो वे उस वक्त झारखंड विधानसभा के सदस्य नहीं थे.

झारखंड की सीटों पर दलों का कब्जा: अब तक का गणित

झारखंड के गठन से लेकर अब तक कुल 31 सदस्य चुनकर उच्च सदन (राज्यसभा) जा चुके हैं. इसमें अलग-अलग दलों की हिस्सेदारी इस प्रकार रही है:

• भारतीय जनता पार्टी (भाजपा): 13 सदस्य
• झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो): 08 सदस्य
• कांग्रेस: 05 सदस्य
• जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू): 01 सदस्य
• राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी): 01 सदस्य
• निर्दलीय: 03 सदस्य

लोकल बनाम बाहरी की कानूनी हकीकत

झारखंड की सियासत में अक्सर यह मुद्दा भी गरमाता है कि राज्य की सीटों पर बाहरी चेहरों को क्यों तरजीह दी जाती है. अब तक झारखंड के कोटे से ऐसे 8 सदस्य राज्यसभा पहुंचे हैं, जो मूल रूप से इस राज्य के बाहर के थे.

• जेडीयू से दिग्विजय सिंह (2002)
• भाजपा से एस.एस. अहलूवालिया (2006), एम.जे. अकबर (2015), और मुख्तार अब्बास नकवी (2016)
• झामुमो से कुंवर दीप सिंह (2010)
• आरजेडी से प्रेमचंद गुप्ता (2014)
• निर्दलीय के रूप में परिमल नथवाणी (2008 और 2014)

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