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झारखंड पुलिस का ‘प्लान-बी’: वर्चुअल आतंक पर लगाम लगाने के लिए लोकल रीढ़ तोड़ने की तैयारी
Ranchi: कोयलांचल धनबाद से लेकर पूरे झारखंड के कारोबारियों के लिए आतंक का दूसरा नाम बन चुका गैंगस्टर प्रिंस खान उर्फ ‘छोटे सरकार’ एक बार फिर पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को खुली चुनौती दे रहा है. धनबाद के बाद अब रांची में बड़े कोयला कारोबारियों, जमीन व्यवसायियों, ज्लेलर्स और डॉक्टरों से लगातार रंगदारी मांगी जा रही है. इस बार कारोबारियों के मोबाइल पर जो नंबर फ्लैश हो रहा है, वह संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) का अंतरराष्ट्रीय कोड (+971) (971545920432 ) है. कारोबारी खौफ के साए में हैं और आम जनता के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब रंगदारी मांगने वाला नंबर पुलिस के पास मौजूद है, तो हाईटेक होने का दावा करने वाली खाकी इस नंबर को लोकेट करके प्रिंस खान का गिरेबान क्यों नहीं पकड़ पा रही है.

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सिम गायब, टावर बेअसर: क्यों फेल हो रहा है पुलिस का पारंपरिक सर्विलांस
पुलिस की हालिया जांच और गिरफ्तारियों में यह बड़ा खुलासा हुआ है कि प्रिंस खान सीधे तौर पर किसी सामान्य सिम कार्ड का उपयोग नहीं करता. उसके गिरोह में कुछ ऐसे तकनीकी एक्सपर्ट या सिप सालार शामिल हैं, जिनका मुख्य काम ही इंटरनेट आधारित VoIP (Voice over Internet Protocol) और वर्चुअल नंबर उपलब्ध कराना है. ये नंबर केवल इंटरनेट कोडिंग पर चलते हैं. इनका कोई फिजिकल टावर लोकेशन या वास्तविक सिम कार्ड अस्तित्व में नहीं होता, जिससे पुलिस का पारंपरिक टावर डंप का तरीका यहां पूरी तरह फेल हो जाता है.
वीपीएन और आईपी स्पूफिंग: डार्क वेब के रास्ते बदल रहा है डिजिटल ठिकाना
पुलिस जब इन अंतरराष्ट्रीय नंबरों के इंटरनेट प्रोटोकॉल (आईपी एड्रेस) को ट्रैक करने की कोशिश करती है, तो पता चलता है कि अपराधी वीपीएन (वर्चुवल प्राइवेट नेटवर्क) और प्रॉक्सी सर्वर का इस्तेमाल कर रहे हैं. कॉल भले ही किसी गुप्त ठिकाने से की जा रही हो, लेकिन तकनीक के जरिए उसका रूट हर मिनट बदल दिया जाता है. कभी सर्वर यूरोप का दिखता है, तो कभी खाड़ी देशों का. इस वजह से पुलिस किसी एक निश्चित नतीजे पर नहीं पहुंच पाती.
रेड कॉर्नर नोटिस बनाम ‘इंटरनेशनल जुरीस्डिक्शन’: कानूनी कागजी कार्रवाई बनी बड़ी बाधा
प्रिंस खान के खिलाफ पहले ही इंटरपोल द्वारा रेड कॉर्नर नोटिस जारी किया जा चुका है और उसके खाड़ी देश (दुबई/यूएई) में छिपे होने की लगातार आशंका जताई जाती रही है. विदेशी नंबर का डेटा हासिल करने के लिए भारतीय जांच एजेंसियों को यूएई सरकार और वहां की टेलीकॉम कंपनियों (जैसे Du या Etisalat) को MLAT (Mutual Legal Assistance Treaty) के तहत न्यायिक अनुरोध भेजना पड़ता है. इस अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया में कागजी कार्रवाई और महीनों का समय लगता है, जिसका फायदा उठाकर अपराधी अपनी डिजिटल पहचान बदल लेता है.
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‘नो-केवाईसी’ ऐप्स का खेल: बिना पहचान पत्र, केवल क्रिप्टोकरेंसी में डीलिंग
क्रिमिनल नेटवर्क आजकल ऐसे इंटरनेशनल कम्युनिकेशन ऐप्स का सहारा ले रहे हैं जो डार्क वेब या बिना किसी पहचान पत्र (No-KYC) के काम करते हैं. इन ऐप्स पर अकाउंट बनाने या वर्चुअल नंबर खरीदने के लिए केवल क्रिप्टोकरेंसी (जैसे बिटकॉइन) में भुगतान किया जाता है. चूंकि पैसे का लेन-देन और पहचान दोनों ही पूरी तरह गुप्त और बेनामी होते हैं, इसलिए पुलिस नंबर हाथ में होने के बावजूद उसके अंतिम छोर (End-user) तक नहीं पहुंच पाती.
झारखंड पुलिस का ‘प्लान-बी’: वर्चुअल आतंक पर लगाम लगाने के लिए लोकल रीढ़ तोड़ने की तैयारी
भले ही साइबर स्पेस में प्रिंस खान का यह विदेशी नंबर पुलिस को छका रहा हो, लेकिन झारखंड पुलिस ने अब उसकी ‘लोकल रीढ़’ को जमीनी स्तर पर तोड़ने की रणनीति बनाई है. पुलिस मुख्यालय के निर्देश पर पुलिस प्रिंस खान के उन स्थानीय गुर्गों को टारगेट कर रही है, जो यहां कारोबारियों की रेकी करते हैं, पर्चा फेंकते हैं और रंगदारी की रकम को हवाला या अन्य माध्यमों से आगे भेजते हैं. केंद्रीय जांच एजेंसियों के समन्वय से उन विशिष्ट इंटरनेट गेटवे को ब्लॉक कराने का प्रयास किया जा रहा है, जिनका उपयोग कर रंगदारी के ये धमकी भरे मैसेज और कॉल डाइवर्ट किए जा रहे हैं.
