Ranchi: झारखंड के 19 जिलों में पिछले 180 दिनों (6 महीने) के भीतर 61 ऐसे शव मिले हैं, जिनकी पहचान आज तक नहीं हो सकी है. ये शव मुर्दाघरों में या पुलिस की फाइलों में आज भी अपने परिजनों की राह देख रहे हैं. पुलिस रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल मिले इन सभी 61 लावारिस शवों का पोस्टमार्टम कराया जा चुका है. इनमें से कई शव नदी, नाले, नहर, रेलवे ट्रैक, सुनसान चौराहों और झाड़ियों से बरामद किए गए थे. वहीं, कुछ शव सड़क हादसों में दम तोड़ने वालों, गंभीर बीमारी से मरने वालों और मानसिक रूप से बीमार लोगों के हैं.
पहचान न होने से अधर में लटकी कई मामलों की जांच
पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन शवों के वारिसों तक पहुंचना है, जिसमें अब तक कामयाबी नहीं मिल सकी है. इस लाचारी का असर सीधे तौर पर अपराध अनुसंधान पर पड़ रहा है.
मृतकों की शिनाख्त न होने के कारण पुलिस कई मामलों में यह भी तय नहीं कर पा रही है कि यह सामान्य मौत है, हादसा है या फिर हत्या. नतीजा यह है कि कई गंभीर मामलों की जांच अधर में लटक गई है और मौतों के पीछे का रहस्य हमेशा के लिए दफन होने की कगार पर है.
जिलावार आंकड़े: कहां मिले कितने लावारिस शव?
– रेल धनबाद: 09
– रेल जमशेदपुर: 08
– धनबाद : 05
– दुमका: 05
– सरायकेला: 04
– गुमला: 04
– कोडरमा: 03
– खूंटी: 03
– लोहरदगा: 03
– रांची: 03
– सिमडेगा: 01
– साहेबगंज: 01
– रामगढ़: 01
– पलामू: 01
– देवघर: 01
– गोड्डा: 01
– बोकारो: 01
– जमशेदपुर: 06
– गढ़वा: 01
– कुल योग: 61
72 घंटे का नियम और DNA सैंपल का सहारा
नियम के मुताबिक, जब भी पुलिस को कोई लावारिस शव मिलता है, तो उसे पोस्टमार्टम के लिए भेजकर पहचान के प्रयास किए जाते हैं. यदि शव मिलने के 72 घंटे के भीतर कोई वारिस सामने नहीं आता या शिनाख्त नहीं हो पाती, तो पुलिस शव की तस्वीरें और हुलिया रिकॉर्ड में दर्ज कर उसका अंतिम संस्कार कर देती है. गंभीर या संदिग्ध मामलों में, भविष्य में किसी भी कानूनी दावे या पहचान के लिए शव का अंतिम संस्कार करने से पहले डीएनए सैंपल सुरक्षित रख लिया जाता है. पुलिस का कहना है कि कई बार शव इतनी क्षत-विक्षत या पुरानी स्थिति में मिलते हैं कि उनका चेहरा पहचानना या फिंगरप्रिंट लेना लगभग असंभव हो जाता है.
सोशल मीडिया और पोर्टल भी हो रहे बेअसर, अपनों की बेरुखी भी एक वजह
लावारिस शवों की पहचान के लिए अब पुलिस पारंपरिक तरीकों के अलावा आधुनिक तकनीक का भी सहारा ले रही है. विभागीय निर्देशों के तहत अज्ञात शवों की तस्वीरें, उनके कपड़े और अन्य विवरण विशेष पोर्टल और सोशल मीडिया पर अपलोड किए जाते हैं. यह जानकारी पड़ोसी जिलों और राज्यों की पुलिस के साथ भी साझा की जाती है. इसके बावजूद सफलता की दर बेहद कम है. इस पूरे मामले का एक और स्याह पहलू यह भी है कि कई बार पुलिस मानसिक रूप से बीमार मृतकों के परिजनों को ढूंढ निकालने में सफल तो हो जाती है, लेकिन इसके बाद भी परिजन लोक-लाज या जिम्मेदारी से बचने के लिए शव लेने से इनकार कर देते हैं. ऐसी स्थिति में पुलिस को ही लावारिसों का वारिस बनकर उनका अंतिम संस्कार करना पड़ता है.



