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न्यूज वेभ एक्सपोजः राज्य सेवा के अफसरों के खिलाफ फाइलों में दफन संगीन अपराध, आदिवासियों की जमीन की दलाली से लेकर जेल की सलाखों तक, जानिए सूबे के हाकिमों के काले कारनामे

Ranchi: जिन राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसरों के कंधों पर राज्य के विकास और आदिवासियों-गरीबों के उत्थान की जिम्मेदारी थी, उन्हीं में...

Ranchi: जिन राज्य प्रशासनिक सेवा के अफसरों के कंधों पर राज्य के विकास और आदिवासियों-गरीबों के उत्थान की जिम्मेदारी थी, उन्हीं में से कई सफेदपोश अफसरों ने अपनी कलम की ताकत को भ्रष्टाचार की ढाल बना लिया. करोड़ों का भूमि घोटाला, रंगे हाथ रिश्वतखोरी, सरकारी जमीन का अवैध हस्तांतरण, न्यायिक हिरासत और ड्यूटी से बिना सूचना लापता रहने जैसे संगीन और अचंभित करने वाले आरोपों की फेहरिस्त लंबी होती जा रही है.

 जानिए अफसरों का पर कैसे-कैसे लगे हैं आरोप

  • जमीन घोटालाः सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, राज्य के सबसे प्रतिष्ठित धार्मिक और ऐतिहासिक जिलों में व्यापक स्तर पर भूमि घोटाले’ को अंजाम दिया गया. अफसरों ने भू-माफियाओं के साथ मिलकर सरकारी, गैर-मजरूआ और प्रतिबंधित जमीनों के रिकॉर्ड में हेराफेरी की. स्थिति इतनी गंभीर रही है कि कई मामलों की आंच सीबीआइ तक पहुंची. अफसरों को सीबीआई की विशेष अदालतों में आत्मसमर्पण (सरेंडर) करना पड़ा और उन्हें महीनों न्यायिक हिरासत में जेल की सलाखों के पीछे गुजारने पड़े.
  • छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम की धज्जियां: आदिवासियों की जमीन की रक्षा के लिए बने सीएनटी एक्ट की धाराओं (जैसे धारा-71ए) का अफसरों ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हुए खुलेआम उल्लंघन किया. बिना किसी भौतिक सत्यापन और समुचित जांच के, सैकड़ों ऐसे मामलों में जहां दशकों से कोई वैध कब्जा नहीं था, आदिवासी भूमि को अवैध रूप से हस्तांतरित कर उसे विनियमित कर दिया गया. इसके बदले करोड़ों रुपये के वारे-न्यारे किए गए.
  • निगरानी का शिकंजा और रंगे हाथ गिरफ्तारी: करदाताओं के पैसों पर पलने वाले ये अफसर आम जनता के छोटे-छोटे कामों, जैसे म्यूटेशन (दाखिल-खारिज), जमीन की पैमाइश या अनापत्ति प्रमाणपत्र देने के बदले हजारों-लाखों रुपये की रिश्वत की मांग करते रहे हैं. भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) या तत्कालीन निगरानी विभाग के धावा दल द्वारा इन अफसरों को रंगे हाथ घूस लेते हुए गिरफ्तार किया गया.
  • रिश्वत और न्यायिक हिरासत का चक्र: गिरफ्तारियों के बाद इन लोक सेवकों को न्यायिक हिरासत में केंद्रीय कारागारों (जैसे जय प्रकाश नारायण केंद्रीय कारा) में भेजा गया. कानून की धज्जियां उड़ाने वाले ये अफसर खुद कैदी बनकर जेल पहुंचे.
  • बिना सूचना मुख्यालय से गायब रहने का आरोपः जिले के संवेदनशील पदों पर बैठे अधिकारी बिना किसी पूर्व सूचना या सक्षम प्राधिकार से अवकाश स्वीकृत कराए हफ्तों और महीनों तक अपने मुख्यालय से गायब रहे. जब जिलों के उपायुक्तों ने औचक निरीक्षण किया या महत्वपूर्ण समीक्षा बैठकें बुलाईं, तो ये अधिकारी नदारद मिले.
  • आम जनता के प्रति असंवेदनशीलता: सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों से अपनी फरियाद लेकर आने वाली जनता अंचल कार्यालयों के चक्कर काटती रही, लेकिन साहब अपने रसूख के चलते न तो जनता को उपलब्ध हुए और न ही सरकार के प्रति जवाबदेह रहे. इसे प्रशासनिक अनुशासनहीनता की पराकाष्ठा माना गया है, जिसके लिए इन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित करना पड़ा.
  • जांच प्रक्रिया को लटकाने का खेल: विभिन्न विभागों के प्रधान सचिवों, विभागीय सचिवों और विभागाध्यक्षों को कार्मिक विभाग द्वारा बार-बार स्मार पत्र भेजे जाने के बावजूद, दागी अफसरों के खिलाफ जांच प्रतिवेदन या स्पष्टीकरण पर मंतव्य वर्षों तक उपलब्ध नहीं कराया जाता.
  • जानबूझकर ढील और अप्रसन्नता: सरकार द्वारा इस लेट-लतीफी पर बार-बार गहरी अप्रसन्नता व्यक्त की गई है. इस लचर व्यवस्था का फायदा उठाकर आरोपी अफसर वर्षों तक मलाईदार पदों पर बने रहते हैं या अपनी विभागीय कार्यवाही को अधर में लटकाए रखते हैं.कई मामलों में तो आरोपी अफसर द्वितीय कारण पृच्छा का जवाब तक नहीं देते और बार-बार आवेदन देकर प्रक्रिया को बाधित करने का प्रयास करते हैं, जो यह दर्शाता है कि उन्हें कानून या सरकार का कोई डर नहीं है.
  • निलंबन और फिर बहाली का खेल: जेल से छूटने के बाद या न्यायिक हिरासत से मुक्त होने के तुरंत बाद ये अफसर विभाग में अपना योगदान समर्पित करते हैं. हालांकि नियमानुसार इन्हें पुनः निलंबित कर कार्मिक विभाग का मुख्यालय तय किया जाता है और जीवन निर्वाह भत्ता दिया जाता है, लेकिन कुछ ही समय बाद ‘समीक्षोपरांत’ इन्हें निलंबन से मुक्त कर दिया जाता है.
  • बर्खास्तगी के मुहाने पर भी राहत: कई ऐसे गंभीर मामले हैं जहां संचालन पदाधिकारी द्वारा आरोपों को शत-प्रतिशत प्रमाणित पाया गया और सरकार के अनुमोदन के बाद इन्हें सेवा से बर्खास्त करने तक की अनुशंसा की गई. बावजूद इसके, ये अधिकारी उच्च न्यायालयों से तकनीकी आधार पर अंतरिम आदेश ले आते हैं या प्रशासनिक शिथिलता का लाभ उठाकर सेवा में बने रहते हैं.

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