Ranchi: अपनी जिंदगी भर की गाढ़ी कमाई को सहारा के हवाले करने वाले झारखंड के करीब एक करोड़ निवेशकों का सब्र अब पूरी तरह टूट चुका है. बरसों के इंतजार, अपनों को खोने के गम और सरकारी आश्वासनों के छलावे से तंग आकर अब इन पीड़ित परिवारों ने न्याय के लिए ‘सड़क’ पर उतरने का फैसला कर लिया है. विश्व भारती जनसेवा संस्थान के बैनर तले आगामी 9 अगस्त 2026 से लोक भवन (राजभवन) के सामने अनिश्चितकालीन सत्याग्रह आंदोलन की शुरुआत होने जा रही है. यह आंदोलन केवल पैसों की वापसी के लिए नहीं, बल्कि उस सिस्टम के खिलाफ है जिसने विधानसभा में वादे तो बड़े-बड़े किए, लेकिन हकीकत की जमीन पर पीड़ितों को सिर्फ तारीखें और आंसू दिए.
झारखंड के 1 करोड़ निवेशकों के डूबे 40,000 करोड़
संस्थान द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक, अकेले झारखंड प्रदेश में लगभग एक करोड़ जमाकर्ताओं का करीब 40,000 करोड़ रुपया सहारा इंडिया ने हड़प लिया है. पूरे देश की बात करें तो यह आंकड़ा 5 लाख करोड़ रुपये के पार है. हालांकि, सीआईडी द्वारा अब तक 32,391.09 करोड़ रुपये का डाटा प्राप्त किया जा चुका है और अपराध अनुसंधान विभाग में कई आपराधिक मामले भी दर्ज हैं.

आंसू और खुदकुशी, फिर भी मुआवजे के नाम पर सन्नाटा
इस पूरे घोटाले का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि पैसे डूबने के सदमे और अवसाद में आकर राज्य के कई निवेशकों ने दम तोड़ दिया, तो कई आत्महत्या करने पर मजबूर हो गए. सरकार ने वादा किया था कि मृत सहारा पीड़ितों के परिजनों को आर्थिक मुआवजा दिया जाएगा। राज्यपाल के अभिभाषण में भी इसका बाकायदा जिक्र (क्रम संख्या 12) था. संस्थान ने दुखद रूप से जान गंवाने वाले 74 मृत पीड़ितों का पूरा डाटा तैयार कर पूर्व पुलिस महानिदेशक के माध्यम से 15 जनवरी 2025 को ही गृह, कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग को भेजा था, लेकिन आज तक एक भी पीड़ित परिवार को फूटी कौड़ी नसीब नहीं हुई.
खुले घूम रहे हैं वारंटी, जांच आयोग की फाइल पर धूल
पीड़ितों में गुस्सा इस बात को लेकर भी है कि सहारा इंडिया के कई बड़े रसूखदार अधिकारियों पर मई 2025 से ही गैर-जमानती वारंट निर्गत है. इनमें ओमप्रकाश श्रीवास्तव, देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव, स्वपना राय, जयब्रत राय, सुशांतो राय, सिमांतो राय और नीरज कुमार पाल जैसे नाम शामिल हैं. लेकिन पुलिस ने अब तक सिर्फ सुन्दर झा और संजीव कुमार को गिरफ्तार किया है, बाकी सभी वारंटी आज भी पुलिस की पकड़ से बाहर खुले घूम रहे हैं. यही नहीं, सहारा पीड़ितों की जांच के लिए ‘कमीशन ऑफ इन्क्वायरी एक्ट 1952’ के तहत जिस ‘जांच आयोग’ के गठन का प्रस्ताव 15 जनवरी 2025 से गृह विभाग में लंबित है, उस पर मुख्यमंत्री के आश्वासनों और निरसा विधायक अरूप चटर्जी के लिखित हस्तक्षेप के बावजूद आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई.
अब झुकने को तैयार नहीं पीड़ित: 9 अगस्त से महाआंदोलन
संस्थान के मुख्य पदाधिकारियों का कहना है कि “जब तक हमारी जायज मांगें पूरी नहीं होंगी, वारंटियों की गिरफ्तारी नहीं होगी, जांच आयोग का गठन नहीं होगा और पीड़ित परिवारों को मुआवजा नहीं मिलेगा, तब तक राजभवन के सामने यह शांतिपूर्ण सत्याग्रह अनवरत जारी रहेगा. अब हम सिर्फ आश्वासनों की घुट्टी पीकर बैठने वाले नहीं हैं. यह आंदोलन झारखंड के उन लाखों बुजुर्गों, विधवाओं और बेबस परिवारों की आखिरी उम्मीद है, जिनकी गाढ़ी कमाई पर रसूखदारों ने कुंडली मार रखी है.
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