Hazaribagh: शहर को सुंदर और व्यवस्थित बनाने के नाम पर नगर निगम का पीला पंजा(JCB)जब गरीब समोसे, चाय और सब्जी बेचने वाले फुटपात दुकानदारों पर चलता है, तो खूब वाहवाही लूटी जाती है. लेकिन इसी नगर निगम की आलीशान बिल्डिंग से कदम भर की दूरी पर सुशासन के दावों की कलई बीच सड़क पर उतर जाती है. हजारीबाग का सबसे व्यस्त और प्रशासनिक रूप से VIP माना जाने वाला जिला परिषद चौक से लेकर DVC चौक तक का पूरा मार्ग आज शहर का सबसे बड़ा और अवैध ‘ओपन बार’ बन चुका है. एक तरफ जहां शहर का बड़ा अस्पताल है और दूसरी तरफ मरीजों व आम जनता की भीड़, वहीं ठीक उसके अपोजिट सड़क के दोनों ओर कतार से सजे छोटे-छोटे होटलों और ढाबों में खुलेआम शराब परोसने का धंधा चल रहा है. सुबह की चाय के साथ ही शुरू होने वाला यह अवैध खेल, सरकारी शराब दुकानें बंद होने के बाद आधी रात तक बेखौफ जारी रहता है.
नाक के नीचे अवैध मयखाना: ट्रैफिक थाने से चंद कदम पर कानून को ठेंगा
इस पूरे मामले का सबसे हैरान और परेशान करने वाला पहलू यह है कि यह पूरा अवैध धंधा किसी सुदूर इलाके में नहीं, बल्कि सीधे कानून के रखवालों की नाक के नीचे चल रहा है. इन होटलों से महज कुछ ही मीटर की दूरी पर ट्रैफिक थाना भी स्थापित है. जिला परिषद चौक से DVC चौक के बीच की इस सड़क पर सुबह से लेकर रात तक ट्रैफिक पुलिस के जवान और आला अधिकारी मुस्तैद रहते हैं. VIP मूवमेंट से लेकर आम गाड़ियों की चेकिंग का अभियान इसी मार्ग पर दिन-भर चलता है. खुद पुलिस अधीक्षक से लेकर कई वरीय प्रशासनिक अधिकारी समय-समय पर इस चौक पर सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लेने पहुंचते हैं. ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जो नजारा शहर के बच्चे-बच्चे को साफ दिखता है, वह दिन-रात वहीं ड्यूटी पर तैनात रहने वाले अफसरों की नजरों से कैसे ओझल है?

‘ड्रिंक एंड ड्राइव’ की चेकिंग का ढोंग, बगल में बैठकर झूम रहे शराबी
इस चौक पर अक्सर पुलिस की टीमें ‘ब्रेथ एनालाइजर’ लेकर ‘ड्रिंक एंड ड्राइव’ चेकिंग अभियान चलाती हैं. चेकिंग के नाम पर आम जनता से जुर्माना वसूला जाता है, लेकिन ठीक उसी समय, सड़क के दूसरी पार इन होटलों और ढाबों के भीतर और बाहर बैठकर लोग सरेआम जाम छलका रहे होते हैं. स्थिति यह है कि शराबियों के जमघट के कारण शाम के वक्त शरीफ लोगों, अस्पताल आने-जाने वाले मरीजों और खासकर महिलाओं-छात्राओं का इस सड़क से गुजरना दूभर हो जाता है. कानून का खौफ इस कदर गायब है कि सरकारी दुकानें बंद होने के बाद जब पियक्कड़ों को कहीं ठिकाना नहीं मिलता, तो वे इन्हीं ढाबों की शरण लेते हैं और मनमाने दामों पर अवैध शराब परोसी जाती है.
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क्या आंखों पर बंधी है पट्टी या ‘सुविधा शुल्क’ का है खेल?
गरीब की रेहड़ी-पटरी उजाड़ने में फुर्ती दिखाने वाला प्रशासनिक महकमा इन रसूखदार होटल और ढाबा संचालकों के सामने आखिर क्यों लाचार नजर आता है? जनता के बीच अब यह चर्चा आम हो चुकी है कि क्या सचमुच अधिकारियों की आंखों पर पट्टी बंधी है, या फिर इस चुप्पी के पीछे ‘महीने की बंधी-बंधाई सेटिंग’ और ‘सुविधा शुल्क’ का कोई गहरा खेल चल रहा है. जब शहर की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए रात-रात भर विशेष अभियान चलाए जा रहे हैं, तो फिर हजारीबाग के दिल कहे जाने वाले इस प्रमुख मार्ग पर चल रहे इस खुलेआम उल्लंघन पर पुलिस प्रशासन की रहस्यमयी खामोशी कई गंभीर सवाल खड़े करती है.


