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Ranchi: राज्यभर के कंप्यूटर ऑपरेटर, दैनिक पारिश्रमिक और आउटसोर्स कर्मी अब आर-पार के मूड में हैं. रविवार को रांची के पुराने विधानसभा मैदान में अशोक सिंह की अध्यक्षता में हुई बैठक में अपनी मांगों को लेकर आंदोलन की रूप रेखा तय की गई. बैठक में सरकार द्वारा हाल ही में जारी की गई अधिसूचना संख्या 4372 एवं 4373 (समाहरणालय एवं क्षेत्रीय कार्यालय लिपिकीय संवर्ग नियमावली-2026) पर मंथन किया गया. कहा कि सरकार की यह नई नियमावली उनके वर्षों के अनुभव का अपमान है. सचिवालय से लेकर सुदूर प्रखंड और अंचल कार्यालयों तक अपनी सेवा दे रहे इन कंप्यूटर ऑपरेटरों ने सरकार की मंशा पर सवाल खड़े कर दिए हैं. उनका आरोप है कि जिस प्रशासनिक व्यवस्था को उन्होंने दिन-रात मेहनत करके संभाला, आज वही सरकार उन्हें दरकिनार करने की कोशिश कर रही है.
कट-ऑफ तिथि के जाल में उलझा भविष्य
बैठक में सबसे बड़ा मुद्दा नियमितीकरण के लिए तय की गई कट-ऑफ तिथि का रहा. कार्मिक विभाग के संकल्प संख्या 4871 के तहत निर्धारित 20 जून 2019 की तिथि को कर्मी अब एक अड़ंगा’ मान रहे हैं. कर्मियों का कहना है कि सात साल पुरानी इस तिथि को आधार मानकर सरकार हजारों अनुभवी युवाओं को नियमितीकरण की दौड़ से बाहर करना चाहती है. बैठक में कट-ऑफ तिथि को वर्तमान तिथि तक विस्तारित किए जाने की मांग की गई. कर्मियों का तर्क है कि यदि वे आज तक सेवा दे रहे हैं, तो उन्हें नियमित होने का पूरा अधिकार है.
अनुभव को मिले सम्मान
कंप्यूटर ऑपरेटर अब केवल नियमितीकरण ही नहीं, बल्कि अपने सम्मान की भी लड़ाई लड़ रहे हैं. बैठक में समान कार्य के लिए समान वेतन का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया. कर्मियों ने दो टूक कहा है कि जब तक उनकी सेवा नियमित नहीं होती, तब तक उन्हें समकक्ष नियमित पदों के न्यूनतम वेतनमान और महंगाई भत्ते का लाभ मिलना चाहिए. यह मांग सर्वोच्च न्यायालय के उस सिद्धांत पर आधारित है, जो कहता है कि एक ही तरह का काम करने वाले कर्मचारियों के बीच वेतन में भारी अंतर करना शोषण की श्रेणी में आता है. साथ ही, उन्होंने नई अधिसूचना में प्रस्तावित परीक्षा और सीमित वेटेज की व्यवस्था को भी अव्यावहारिक’ और कर्मचारी विरोधी करार दिया है.
सरकार से सकारात्मक वार्ता पर बनी सहमति
बैठक में राज्य के मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री को संदेश भेजा गया है, जिसमें प्रतिनिधिमंडल ने सरकार से सकारात्मक वार्ता की अपील की है, लेकिन साथ ही साथ भी कहा है कि कि यदि उनकी मांगों पर शीघ्र निर्णय नहीं लिया गया, तो वे अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं.
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