Hazaribagh: हजारीबाग नगर निगम क्षेत्र के अंतर्गत अतिक्रमण हटाने के नाम पर पिछले कुछ दिनों से जारी बलपूर्वक प्रशासनिक कार्रवाई अब एक बड़े कानूनी विवाद में तब्दील हो गई है. गरीब फुटपाथ दुकानदार संघ के प्रांतीय सलाहकार तथा अखिल भारतीय मजदूर संगठन (झारखंड) के प्रदेश अध्यक्ष अधिवक्ता विवेक कुमार वाल्मीकि ने निगम प्रशासन द्वारा की गई तोड़-फोड़ और बेदखली की तीखी भर्त्सना की है. उन्होंने कहा कि माननीय उच्च न्यायालय द्वारा शहर को व्यवस्थित करने के संबंध में दिए गए आदेशों की जानबूझकर गलत, भ्रामक और आधी-अधूरी व्याख्या की जा रही है. निगम प्रशासन अपनी प्रशासनिक और सांगठनिक विफलताओं को छुपाने तथा शहर की यातायात व्यवस्था को सुधारने में अपनी नाकामी का पूरा गुस्सा निर्दोष, गरीब और असहाय रेहड़ी-पटरी दुकानदारों पर निकाल रहा है. उन्होंने साफ किया कि बिना किसी पूर्व सूचना या तैयारी के, दुकानों को अचानक ध्वस्त करना मानवाधिकारों और देश के संविधान द्वारा प्रदत्त आजीविका के अधिकार पर एक क्रूर प्रशासनिक प्रहार है.
अधिनियम की धाराओं को ताक पर रखकर आधा-अधूरा सच फैला रहा प्रशासन
अधिवक्ता विवेक कुमार वाल्मीकि ने प्रशासनिक अधिकारियों को सीधे विधिक चुनौती देते हुए स्पष्ट किया कि माननीय उच्च न्यायालय ने अपने किसी भी फैसले में यह आदेश कभी नहीं दिया कि देश की संसद द्वारा पारित वैधानिक अधिनियमों के प्रावधानों को पूरी तरह से ठंडे बस्ते में डाल दिया जाए और बिना किसी वैकल्पिक और स्थायी व्यवस्था के गरीबों को उनके स्वरोजगार से बेदखल कर सड़क पर भूखा मरने के लिए असहाय छोड़ दिया जाए. उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासन आम जनता और छोटे व्यापारियों के बीच एक भ्रामक वातावरण तैयार कर रहा है. इस बर्बर और दमनकारी प्रशासनिक कार्रवाई के खिलाफ संघ चुप नहीं बैठेगा और अतिशीघ्र तमाम कानूनी दस्तावेजों के साथ उच्च न्यायालय में एक सुदृढ़ विधिक याचिका दायर कर न्याय की गुहार लगाएगा.
इन तीन प्रमुख वैधानिक स्तंभों पर टिकी है दुकानदारों की विधिक लड़ाई
अधिवक्ता वाल्मीकि ने नगर निगम की इस कार्रवाई के खिलाफ तीन अत्यंत महत्वपूर्ण और अकाट्य कानूनी आधार प्रस्तुत किए हैं, जो इस प्रकार हैं: ‘स्ट्रीट वेंडर्स अधिनियम 2014’ की धारा 3(3) की अवहेलना: देश की संसद द्वारा पारित यह केंद्रीय कानून साफ तौर पर निर्देशित करता है कि जब तक नगर निगम पूरे शहरी क्षेत्र के सभी फुटपाथ दुकानदारों का एक आधिकारिक और व्यापक सर्वे पूरा नहीं कर लेता और उन्हें विधिक ‘वेंडिंग सर्टिफिकेट’ (दुकानदारी का प्रमाण पत्र) जारी नहीं कर देता, तब तक किसी भी परिस्थिति में किसी को भी उसके रोजगार स्थल से उजाड़ा या विस्थापित नहीं किया जा सकता. हजारीबाग नगर निगम अपने इस प्राथमिक और कानूनी दायित्व को पूरा करने में अब तक पूरी तरह विफल रहा है.
‘व्हाइट पट्टी’ का प्रशासनिक भ्रम: वर्तमान कानून के भीतर किसी भी प्रकार की तात्कालिक ‘सफेद पट्टी’ या कामचलाऊ व्यवस्था का कोई स्थान नहीं है. कानून के तहत नगर निगम के लिए शहर में ‘परमानेंट वेंडिंग जोन’ (स्थायी बाजार क्षेत्र) का निर्माण करना अनिवार्य है. बिना किसी स्थायी वेंडिंग जोन के शहर की सड़कों को जाम से पूरी तरह मुक्त कर पाना व्यावहारिक रूप से पूरी तरह असंभव है. संवैधानिक अधिकारों पर कुठाराघात: नगर निगम की यह एकपक्षीय कार्रवाई भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (मानवीय गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार) और अनुच्छेद 19(1)(g) (देश के भीतर किसी भी नागरिक को अपनी आजीविका और स्वरोजगार चलाने का मौलिक अधिकार) का सीधा और स्पष्ट उल्लंघन है.
मतभेदों को भुलाकर एक सुर में आवाज उठाने का आह्वान, एकजुटता से मिलेगी सफलता
इस विकट प्रशासनिक संकट के बीच, संघ के केंद्रीय नेतृत्व ने हजारीबाग के समस्त छोटे दुकानदारों, खोमचे वालों और साप्ताहिक बाजार के व्यापारियों से अपने तमाम व्यक्तिगत मतभेदों, पुरानी शिकायतों और आपसी गुटबाजियों को पूरी तरह से परे रखकर ‘गरीब फुटपाथ दुकानदार संघ’ के मजबूत बैनर तले पूरी तरह से एकजुट होने की मर्मस्पर्शी अपील की है. अधिवक्ता वाल्मीकि ने कहा कि प्रशासनिक तंत्र हमेशा से “फूट डालो और राज करो” की नीति पर काम करता आया है, ताकि दुकानदारों की एकता को खंडित कर आंदोलन को पूरी तरह से कुचला जा सके. इस प्रशासनिक चक्रव्यूह को नाकाम करने के लिए संपूर्ण दुकानदार समाज और उनके नेतृत्व का एक सुर और एक आवाज में बोलना नितांत अनिवार्य है. यदि इस समय दुकानदार आपसी फूट के कारण अलग-अलग धड़ों में बंट गए, तो यह आजीविका बचाने का पवित्र आंदोलन कमजोर हो जाएगा. उन्होंने अंत में पूर्ण विश्वास प्रकट करते हुए दोहराया कि संघ कानूनी मोर्चे पर अदालत के भीतर और जमीनी मोर्चे पर सड़कों पर, दोनों ही स्तरों पर पूरी ताकत के साथ लड़ेगा भी और अपने हक की इस लड़ाई को जीतेगा भी.
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