पाथरडीह वाशरी के लिए 1961 में हुआ भूमि अधिग्रहण वैध, 65 साल पुराने मामले में जमीन लौटाने की मांग हाईकोर्ट ने ठुकराई

Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने धनबाद के पाथरडीह कोल वाशरी के लिए वर्ष 1960-61 में अधिग्रहित जमीन को लेकर दायर याचिका खारिज कर...

Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने धनबाद के पाथरडीह कोल वाशरी के लिए वर्ष 1960-61 में अधिग्रहित जमीन को लेकर दायर याचिका खारिज कर दी. न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने कहा कि भूमि अधिग्रहण विधि सम्मत प्रक्रिया के तहत हुआ था, प्रभावित रैयतों को मुआवजा भी दिया गया था और अब दशकों बाद अधिग्रहण की वैधता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता.

याचिकाकर्ताओं का दावा उनके पूर्वजों की लगभग 200 एकड़ कृषि भूमि पाथरडीह वाशरी के लिए अधिग्रहित की थी 

याचिकाकर्ताओं का दावा था कि उनके पूर्वजों की लगभग 200 एकड़ कृषि भूमि पाथरडीह वाशरी के लिए अधिग्रहित की गई थी . उन्हें बहुत कम मुआवजा मिला. पुनर्वास का लाभ नहीं दिया गया और अधिग्रहित भूमि का बड़ा हिस्सा खाली पड़ा है. उनका आरोप था कि BCCL इस जमीन का उपयोग निजी कंपनी मोनेट इस्पात एंड एनर्जी लिमिटेड के लिए कर रही है, इसलिए जमीन उन्हें वापस की जाए.

राज्य सरकार और BCCL ने अदालत में पेश की अपनी दलील 

राज्य सरकार और BCCL ने अदालत को बताया कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 की धारा 4 और 5-ए के तहत पूरी कानूनी प्रक्रिया अपनाकर किया गया था. अधिग्रहण पुरस्कार (Award) पारित हुआ था और वर्ष 1963 में संबंधित रैयतों को मुआवजा भी दे दिया गया था. BCCL ने यह भी स्पष्ट किया कि जमीन किसी निजी कंपनी को हस्तांतरित नहीं की गई है, बल्कि केवल पाथरडीह वाशरी के निर्माण, संचालन और रखरखाव के लिए अनुबंध दिया गया था.

हाईकोर्ट ने कहा याचिकाकर्ताओं ने स्वीकार किया है कि भूमि अधिग्रहण हुआ था

हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने स्वयं स्वीकार किया है कि भूमि अधिग्रहण हुआ था और मुआवजा भी प्राप्त किया गया था. अदालत ने यह भी माना कि बाद में राज्य सरकार द्वारा रिकॉर्ड पर पुरस्कार (Award) प्रस्तुत कर दिया गया, इसलिए यह दलील स्वीकार नहीं की जा सकती कि अधिग्रहण बिना पुरस्कार के हुआ था. अदालत ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि केवल लगान (Rent Receipt) की रसीद से किसी व्यक्ति का स्वामित्व सिद्ध नहीं होता. साथ ही, यदि सार्वजनिक उद्देश्य के लिए अधिग्रहित भूमि का मूल उद्देश्य पूरा हो जाए, तब भी उसका उपयोग किसी अन्य सार्वजनिक उद्देश्य के लिए किया जा सकता है, उसे पूर्व मालिकों को वापस देने का कोई कानूनी अधिकार नहीं बनता.

CNT Act की दलील इस मामले में लागू नहीं होती

कोर्ट ने यह भी माना कि छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act) की दलील इस मामले में लागू नहीं होती, क्योंकि भूमि का अधिग्रहण विधिवत सरकारी प्रक्रिया के तहत हुआ था. अंततः अदालत ने कहा कि वर्ष 1961 में हुए अधिग्रहण को 2013 में चुनौती देने का कोई आधार नहीं है और याचिका खारिज कर दी.

Also Read: गिरिडीह: प्रेम प्रसंग बना खूनी साजिश, शादी से बचने के लिए युवक की बेरहमी से हत्या, जंगल में दफनाया शव का कंकाल बरामद

सम्बंधित ख़बरें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *