प्रकृति पूजा और आदिवासी अस्मिता का प्रतीक सरहुल, झारखंड का सबसे पवित्र और ऐतिहासिक पर्व

साल वृक्ष, धरती माता और प्रकृति के प्रति आस्था का उत्सव, सदियों पुरानी परंपरा और आदिवासी संस्कृति की पहचान रांची : झारखंड...

साल वृक्ष, धरती माता और प्रकृति के प्रति आस्था का उत्सव, सदियों पुरानी परंपरा और आदिवासी संस्कृति की पहचान

रांची : झारखंड में प्रकृति पूजा का सबसे बड़ा और पवित्र त्योहार सरहुल इस वर्ष 21 मार्च को पूरे उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाया जाएगा. इस पर्व को लेकर राजधानी रांची सहित राज्य के विभिन्न जिलों में तैयारियां तेज हो गई हैं. सरहुल आदिवासी समाज का प्रमुख त्योहार है, जो धरती माता, जंगल और साल वृक्ष के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का प्रतीक माना जाता है. हर साल चैत्र महीने में साल के पेड़ों में नए फूल आने के साथ इस पर्व का आयोजन किया जाता है. इस दिन गांवों और शहरों के सरना स्थलों पर विशेष पूजा-अर्चना की जाती है और प्रकृति से सुख-समृद्धि तथा अच्छी वर्षा की कामना की जाती है.

सदियों पुरानी परंपरा और आदिवासी आस्था का पर्व


सरहुल पर्व का इतिहास सैकड़ों वर्षों पुराना माना जाता है और इसका गहरा संबंध आदिवासी जीवन और प्रकृति से जुड़ा हुआ है. आदिवासी समाज प्रकृति को ही ईश्वर का रूप मानता है और इसी आस्था के कारण इस पर्व को विशेष महत्व दिया जाता है. सरहुल के दिन गांव के पुजारी जिन्हें पाहन कहा जाता है, वे सरना स्थल पर साल के फूलों के साथ विशेष पूजा करते हैं. इस पूजा में पूरे गांव की खुशहाली, अच्छी बारिश और समृद्धि की कामना की जाती है. पूजा के बाद साल के फूलों को प्रसाद के रूप में लोगों में बांटा जाता है. यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी उतनी ही श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जाती है.

सरहुल जुलूस में दिखती है झारखंड की समृद्ध संस्कृति


सरहुल पर्व के अवसर पर झारखंड के विभिन्न शहरों और गांवों में भव्य जुलूस निकाले जाते हैं. पारंपरिक वेशभूषा में सजे युवक-युवतियां मांदर, ढोल और नगाड़ों की थाप पर नृत्य करते हुए जुलूस में शामिल होते हैं. महिलाएं रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधान पहनकर लोकगीत गाती हैं और नृत्य करती हैं. राजधानी रांची में निकलने वाला सरहुल जुलूस पूरे राज्य में सबसे प्रसिद्ध माना जाता है, जिसमें हजारों लोग भाग लेते हैं. यह जुलूस झारखंड की समृद्ध आदिवासी संस्कृति और सामाजिक एकता की झलक प्रस्तुत करता है.

प्रकृति संरक्षण और सांस्कृतिक पहचान का संदेश देता सरहुल


सरहुल केवल एक धार्मिक पर्व नहीं बल्कि प्रकृति संरक्षण और पर्यावरण के प्रति जागरूकता का भी संदेश देता है. यह पर्व हमें सिखाता है कि मनुष्य और प्रकृति का संबंध अटूट है और पर्यावरण की रक्षा करना हमारी जिम्मेदारी है. झारखंड के अलावा ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल के कई आदिवासी क्षेत्रों में भी यह पर्व मनाया जाता है. आज सरहुल केवल आदिवासी समाज का ही नहीं बल्कि पूरे झारखंड की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है और इसे राज्य के सबसे महत्वपूर्ण और गौरवपूर्ण त्योहारों में गिना जाता है.

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