मौसीबाड़ी से मुख्य मंदिर लौटे महाप्रभु: अलौकिक घुरती रथयात्रा के साथ संपन्न हुआ महामहोत्सव, भक्ति रस से सराबोर हुई झारखंड की धरा

Ravi Bharti Ranchi: राजधानी रांची के ऐतिहासिक जगन्नाथपुर मंदिर में पिछले नौ दिनों से चल रहे महाप्रभु के पावन प्रवास का उत्सव...

Mahaprabhu returns to the main temple from Mausibari: The grand festival concludes with the supernatural Ghurati Rath Yatra, the land of Jharkhand is drenched in devotion.

Ravi Bharti

Ranchi: राजधानी रांची के ऐतिहासिक जगन्नाथपुर मंदिर में पिछले नौ दिनों से चल रहे महाप्रभु के पावन प्रवास का उत्सव शनिवार को घुरती रथयात्रा (बहुड़ा यात्रा) के साथ अपने चरम और विश्राम की अवस्था तक पहुंच गया. नौ दिनों तक अपनी मौसी के घर यानी मौसीबाड़ी में आतिथ्य स्वीकार करने के बाद जगत के पालनहार भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा अपने निज मंदिर यानी मुख्य गर्भगृह में वापस लौट आए हैं. यह वापसी केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भक्त और भगवान के बीच के उस अटूट और वात्सल्यमय प्रेम का जीवंत प्रमाण है, जिसके लिए सनातन संस्कृति सदियों से पूजित रही है.

नौ दिवसीय प्रवास का समापन और बहुड़ा यात्रा का दिव्य प्रसंग

बीते 16 जुलाई को जब आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर महाप्रभु अपने भव्य रथ पर सवार होकर मौसीबाड़ी के लिए निकले थे, तब रांची की हर एक गली आस्था के सैलाब में डूब गई थी. नौ दिनों तक मौसीबाड़ी में रुकने के बाद भगवान ने अपने भक्तों को विभिन्न रूपों में दर्शन दिए और उनकी हर मनोकामना को आत्मसात किया. शुक्रवार और शनिवार की संधि बेला में जब घुरती रथयात्रा का श्रीगणेश हुआ, तो श्रद्धालुओं की आंखें नम और हृदय कृतज्ञता से भर उठे. मान्यता है कि मौसीबाड़ी में नौ दिनों तक विश्राम करने के बाद जब भाई-बहन अपने मुख्य धाम की ओर लौटते हैं, तो यह यात्रा जीव की आत्मा के परमात्मा से पुनः मिलने की तड़प को दर्शाती है. मंदिर परिसर में वैदिक मंत्रोच्चार, शंखनाद और हरिनाम संकीर्तन के बीच जब तीनों रथों को वापस खींचा गया, तो ऐसा प्रतीत हुआ मानो साक्षात वैकुंठ लोक रांची की धरती पर उतर आया हो.

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भक्ति और उल्लास का संगम: मेला और सांस्कृतिक धरोहर

रथयात्रा और बहुड़ा यात्रा केवल धार्मिक कर्मकांड का नाम नहीं है, बल्कि यह सनातन संस्कृति की वह जीवंत धारा है जो समाज को एक सूत्र में पिरोती है. घुरती रथ के अंतिम दिनों में रांची के जगन्नाथपुर मंदिर परिसर में उमड़ा जनसैलाब इस बात का गवाह है कि आधुनिकता की अंधी दौड़ के बीच भी हमारी जड़ें अपनी परंपराओं से कितनी मजबूती से जुड़ी हुई हैं.

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श्रद्धालुओं का हुजूम

झारखंड के कोने-कोने से ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्यों से भी लाखों की संख्या में पहुंचे भक्तों ने महाप्रभु के रथ की रस्सी को छूने के लिए लंबी कतारों का इंतजार किया. लोगों का विश्वास था कि रथ की रस्सी को खींचने मात्र से जन्म-जन्मांतर के पाप कट जाते हैं और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है.

बाल गोपालों का आनंद

मेले के अंतिम चरण में बच्चों के चेहरों पर जो मुस्कान और उत्साह था, वह देखते ही बनता था. पारंपरिक झूलों, खिलौनों की दुकानों और लोक संस्कृति से जुड़ी वस्तुओं की खरीदारी ने इस मेले को एक भव्य पारिवारिक उत्सव का रूप दे दिया.

सामुदायिक सहभागिता

जाति, वर्ग और संप्रदाय की सीमाओं से ऊपर उठकर हर व्यक्ति ने इस महायज्ञ में अपनी आहुति दी. किसी ने सेवा भाव से भंडारे का आयोजन किया तो किसी ने धूप और गर्मी के बीच राहगीरों को जल पिलाकर पुण्य कमाया.

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देवशयनी एकादशी और चातुर्मास का आध्यात्मिक महत्व

25 जुलाई का यह पावन दिवस एक साथ दो बड़े आध्यात्मिक पर्वों का साक्षी बना है. एक तरफ जहां घुरती रथयात्रा के साथ नौ दिवसीय रथ महोत्सव का समापन हुआ, वहीं दूसरी तरफ देवशयनी एकादशी के साथ चातुर्मास का भी आरंभ हो गया है. धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा के लिए प्रस्थान करते हैं. इसे ही चातुर्मास (चार महीनों की योगनिद्रा अवधि) का आरंभ माना जाता है. इस विशेष कालखंड के प्रारंभ होते ही भगवान जगन्नाथ के दर्शन भी कुछ समय के लिए सीमित हो जाते हैं और मंदिर में केवल नियमित, गुप्त और सात्विक पूजा-अर्चना ही जारी रहती है. अब सीधे देवोत्थान एकादशी (कार्तिक शुक्ल एकादशी) के दिन जब भगवान योगनिद्रा से जागृत होंगे, तब एक बार फिर से विशेष अनुष्ठान और उत्सवों का दौर प्रारंभ होगा. यह चार महीने का समय आत्मसंयम, साधना, व्रत और ईश्वराराधना के लिए सर्वोत्तम माना गया है.

Mahaprabhu returns to the main temple from Mausibari: The grand festival concludes with the supernatural Ghurati Rath Yatra, the land of Jharkhand is drenched in devotion.

आस्था की निरंतरता और अगले वर्ष की प्रतीक्षा

रांची के जगन्नाथपुर मंदिर में संपन्न हुई यह घुरती रथयात्रा केवल एक अनुष्ठान का अंत नहीं है, बल्कि यह इस अटूट विश्वास की शुरुआत है कि जगत के स्वामी अपने भक्तों की सुध लेने अगले वर्ष फिर लौटेंगे. यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन की भागदौड़ के बीच भगवान के प्रति समर्पण और समाज के प्रति सेवा भाव ही मनुष्य का सबसे बड़ा धर्म है. जब मंदिर के पट धीरे-धीरे अपनी सामान्य व्यवस्था की ओर लौटने लगे हैं और मेले की चहल-पहल शांत होने लगी है, तब भी हर भक्त के हृदय में महाप्रभु के चरण कमलों की छाप अमिट रूप से अंकित हो चुकी है. यह रथयात्रा याद दिलाती है कि हमारी संस्कृति जीवित है, हमारी आस्था अक्षुण्ण है और रांची की इस पवित्र माटी पर भगवान जगन्नाथ की कृपा की छत्रछाया सदैव बनी रहेगी

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