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झारखंड का ऐतिहासिक पड़ाव: सुरक्षा बलों की बड़ी कामयाबी, कोल्हान का घना जंगल नक्सल-मुक्त

SAURAV SINGH Ranchi: झारखंड में वामपंथी उग्रवाद (माओवाद) के खिलाफ जारी लंबे संघर्ष में सुरक्षा बलों ने एक ऐतिहासिक और रणनीतिक सफलता...

SAURAV SINGH

Ranchi: झारखंड में वामपंथी उग्रवाद (माओवाद) के खिलाफ जारी लंबे संघर्ष में सुरक्षा बलों ने एक ऐतिहासिक और रणनीतिक सफलता हासिल की है. झारखंड पुलिस मुख्यालय के रिपोर्ट के मुताबिक राज्य के सबसे दुर्गम और लाल गलियारे का मुख्य केंद्र माने जाने वाले कोल्हान प्रमंडल (विशेषकर सारंडा, पोड़ाहाट, टोंटो और गोइलकेरा के जंगल) को नक्सली-माओवादी प्रभाव से लगभग पूरी तरह मुक्त करा लिया गया है. सुरक्षा बलों द्वारा चलाए गए बहुस्तरीय सर्च ऑपरेशनों के बाद दशकों से नक्सलियों का सुरक्षित ठिकाना रहा यह इलाका अब सुरक्षा बलों के पूर्ण नियंत्रण में आ चुका है.

इन बड़े नक्सल अभियान से कोल्हान हुआ नक्सल मुक्त

चाईबासा के कोल्हान और सारंडा जंगल क्षेत्र में भाकपा माओवादी और अन्य प्रतिबंधित नक्सली संगठनों के सफाए के लिए सुरक्षाबलों द्वारा समय-समय पर कई बड़े और विशेष नक्सल विरोधी अभियान चलाए गए हैं.

  • ऑपरेशन एनाकोंडा: यह ऑपरेशन साल 2011 में शुरू हुआ था. माओवादियों के कथित राष्ट्रीय मुख्यालय को ध्वस्त करने और सारंडा जंगल से उनके नेटवर्क को उखाड़ फेंकने के लिए चलाया गया पहला सबसे बड़ा संयुक्त अभियान था. इसमें केंद्रीय बलों और राज्य पुलिस की कई टुकड़ियों ने भाग लिया था.
  • ऑपरेशन मेघाहंट: माओवादियों के शीर्ष केंद्रीय समिति सदस्यों और उनके सशस्त्र दस्तों की गतिविधियों पर लगाम लगाने के लिए चलाए गए इस अभियान का उद्देश्य घने जंगलों में छिपे नक्सली बंकरों, हथियारों के जखीरों और प्रशिक्षण शिविरों को चिह्नित कर नष्ट करना था.
  • ऑपरेशन ट्रिपल जंक्शन: झारखंड के चाईबासा-ओडिशा- छत्तीसगढ़ सीमावर्ती क्षेत्र में यह ऑपरेशन चलाया गया. राज्य सीमाओं के त्रिकोण का फायदा उठाकर भागने वाले नक्सलियों को घेरने के लिए पड़ोसी राज्यों की पुलिस और केंद्रीय सुरक्षाबलों के साथ समन्वय स्थापित कर यह संयुक्त अभियान चलाया गया था.
  • कोल्हान-टोंटो-गोइलकेरा विशेष सर्च अभियान: चाईबासा जिले के टोंटो, गोइलकेरा, छोटानागरा, रेंगड़ा, और कुईड़ा के जंगल में यह ऑपरेशन चलाया गया था. उस समय शीर्ष माओवादी नेता मिसिर बेसरा, अनल दा, अनमोल आदि के दस्तों को घेरने के लिए सुरक्षाबलों ने कोल्हान के अति-संवेदनशील कोर क्षेत्रों में फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस और 17 से अधिक नए सुरक्षा कैंप स्थापित किए. इस ऑपरेशन के दौरान सैकड़ों बंकरों, हजारों मीटर कोडेक्स वायर, और भारी मात्रा में आईईडी, डेटोनेटर को बरामद किया गया.
  • ऑपरेशन नवजीवन: नक्सल विरोधी अभियानों के साथ-साथ भटके हुए युवाओं और संगठन के कैडरों को मुख्यधारा में वापस लाने, आत्मसमर्पण कराने और पुनर्वास नीति का लाभ देने के लिए चलाया गया रणनीतिक अभियान. इसके तहत कोल्हान और सारंडा क्षेत्र के दर्जनों इनामी व सक्रिय नक्सलियों ने हथियार डाले है.
  • सारंडा-कुमडीह जॉइंट एनकाउंटर ऑपरेशन: चाईबासा जिले के छोटानागरा और कुमडीह क्षेत्र में इस साल जनवरी महीने में कोबरा, झारखंड जगुआर और सीआरपीएफ की संयुक्त टीम द्वारा गुप्त सूचना के आधार पर चलाया गया अब तक का सबसे सफल और निर्णायक अभियान चलाया गया था. इस ऑपरेशन के दौरान करोड़ रुपये के इनामी केंद्रीय समिति सदस्य अनिल उर्फ पतिराम मांझी (अनल दा) सहित 17 कुख्यात माओवादी ढेर किए गए, जिससे कोल्हान क्षेत्र में माओवादी सांगठनिक ढांचे को सबसे बड़ा झटका लगा था.

नक्सलियों के आखिरी कोर दस्तों को घेरकर अलग-थलग कर दिया गया था

कोल्हान के बीहड़ जंगलों में नक्सलियों का सफाया करने के लिए केंद्रीय और राज्य पुलिस बलों का एक विशाल और सुनियोजित अभियान चलाया गया. इस अभियान में सीआरपीएफ, कोबरा बटालियन झारखंड जगुआर और पश्चिम सिंहभूम जिला पुलिस बल की संयुक्त टीमें तैनात रहीं. टोंटो, गोइलकेरा और दलमा से सटे त्रिकोण क्षेत्रों में नक्सलियों के आखिरी कोर दस्तों को घेरकर अलग-थलग कर दिया गया.

घने जंगलों के भीतर माओवादियों द्वारा स्थापित कई गुप्त ट्रेनिंग कैंप, अस्थायी बंकर और राशन डिपो को सुरक्षा बलों ने पूरी तरह ध्वस्त कर दिया. कोल्हान क्षेत्र लंबे समय से प्रतिबंधित भाकपा माओवादी संगठन की शीर्ष राज्यीय व केंद्रीय कमेटियों (जैसे मिसिर बेसरा, आकाश व अन्य दस्ता सदस्यों) का मुख्य गढ़ रहा था. सुरक्षा बलों के नए सुरक्षा कैंपों की स्थापना के कारण इन बड़े नक्सलियों का राशन, हथियार और सूचना नेटवर्क पूरी तरह से ध्वस्त हो गया था.

लगातार मुठभेड़ों, आत्मसमर्पण नीतियों और शीर्ष कैडरों की गिरफ्तारी के चलते नक्सली संगठन की रीढ़ टूट चुकी है

– पश्चिम सिंहभूम (चाईबासा) के सारंडा और कोल्हन जंगल क्षेत्र में सुरक्षाबलों (झारखंड पुलिस, कोबरा बटालियन, सीआरपीएफ और झारखंड जगुआर) द्वारा चलाए गए नक्सल-विरोधी अभियानों में भाकपा (माओवादी) के कई प्रमुख शीर्ष कमांडर व कैडर मुठभेड़ में मारे गए हैं.

  • 23 जनवरी 2026: चाईबासा जिले के छोटानागरा थाना क्षेत्र के कुमडीह-बहदा और सारंडा के जंगलों में दो दिनों तक चली भीषण मुठभेड़ में एक करोड़ इनामी पतिराम मांझी और उसके दस्ते के कुल 17 माओवादी ढेर किए गए.
  • 07 सितंबर 2025: चाईबासा जिले के गोइलकेरा थाना क्षेत्र स्थित रेलापारा में हुई मुठभेड़ में अमित हांसदा उर्फ आप्टन मारा गया. वह भाकपा माओवादी का जोनल कमांडर, जिस पर झारखंड सरकार द्वारा 10 लाख रुपये का इनाम रखा गया था.
  • 13 अगस्त 2025: भाकपा माओवादी का एरिया कमांडर अरुण कुमार गोइलकेरा थाना क्षेत्र के पोसैता के जंगलों में पुलिस व कोबरा बटालियन के साथ मुठभेड़ के दौरान मारा गया था.

कोल्हान में सक्रिय एक करोड़ इनामी मिसिर बेसरा समेत कई नक्सली हुए गिरफ्तार

झारखंड पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों के लिए लंबे समय से चुनौती बना भाकपा माओवादी का स्पेशल एरिया कमेटी सदस्य अजय महतो उर्फ मोछु उर्फ अंजन दा उर्फ टाइगर उर्फ बुधराम उर्फ श्रीकांत उर्फ बासुदेव को गिरफ्तार 17 जुलाई को गिरिडीह से गिरफ्तार हुआ था. अजय महतो पर 25 लाख रुपये का इनाम घोषित था. अजय महतो उर्फ टाइगर को गिरफ्तार करने के लिए झारखंड पुलिस पिछले डेढ़ से दो दशक से परेशान थी. टाइगर जंगल हो या शहर कहीं भी बड़ी नक्सली वारदातों को अंजाम देकर चला जाता था.

झारखंड में माओवादी संगठन को बड़ा झटका देते हुए एक करोड़ रुपये के इनामी शीर्ष माओवादी मिसिर बेसरा को बीते 28 जुलाई को गिरिडीह जिले से गिरफ्तार कर लिया गया था. उसके साथ माओवादी संगठन के सक्रिय सदस्य मेहनत उर्फ मोच्छू और गौरव को भी सुरक्षाबलों ने पकड़ा था.

झारखंड-पश्चिम बंगाल सीमा पर सरायकेला जिले में पुलिस और सीआरपीएफ के संयुक्त अभियान में बीते पांच अगस्त को 22 लाख रुपए के इनामी तीन नक्सलियों को गिरफ्तार कर लिया गया था. गिरफ्तार नक्सलियों में 15 लाख का इनामी मदन महतो उर्फ शंकर महतो, पांच लाख का इनामी रवि सिंह सरदार उर्फ सागर सिंह और दो लाख की इनामी मीना पहाड़िया उर्फ नीपू पहाड़िया उर्फ मीरा शामिल थे. इनके पास से सुरक्षा बलों ने तीन एके-47 राइफलें बरामद की थी.

अब सबसे बड़ी चुनौती: जंगलों से IED और स्पाइक होल हटाना

जंगल नक्सल-मुक्त होने के बावजूद पुलिस और सुरक्षा बलों के सामने अब सबसे बड़ा जोखिम नक्सलियों द्वारा ज़मीन के नीचे बिछाए गए लैंडमाइंस और स्पाइक होल्स हैं. नक्सलियों ने अपनी भागने की राहों और जंगल के रास्तों पर बड़े पैमाने पर आईईडी लगा रखे थे. बम निरोधक दस्ता और स्निफर डॉग्स की मदद से सुरक्षा बल प्रतिदिन पगडंडियों और जंगलों में डी-माइनिंग अभियान चला रहे हैं, ताकि आम ग्रामीणों और मवेशियों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके.

विकास और मुख्यधारा से जुड़ेगा कोल्हान

कोल्हान के नक्सल मुक्त होने से क्षेत्र में विकास कार्यों को तेज गति मिलेगी. इसके अलावा जंगलों के भीतर दशकों से रुके पड़े सड़क, पुल-पुलिया और मोबाइल टावर निर्माण कार्य अब तेजी से पूरे किए जा सकेंगे. साथ ही दूरदराज के आदिवासी गांवों तक स्वास्थ्य, शिक्षा और राशन जैसी मूलभूत सरकारी सुविधाएं अब बिना किसी नक्सली भय के पहुंचेंगी.

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