Hazaribagh: हजारीबाग शहर की लाइफलाइन और सबसे खूबसूरत पर्यटन स्थल माने जाने वाले झील परिसर को ‘नो व्हीकल जोन’ घोषित करने के मामले ने अब एक नया और बेहद गरमा-गरम राजनीतिक रूप अख्तियार कर लिया है. इस पूरे विवाद के बीच अब नगर निगम के डिप्टी मेयर अविनाश यादव का एक बेहद चौंकाने वाला और बड़ा बयान सामने आया है, जिसने प्रशासनिक गलियारों में खलबली मचा दी है. डिप्टी मेयर ने साफ तौर पर स्पष्ट कर दिया है कि नगर निगम की बोर्ड बैठक में झील परिसर को ‘नो व्हीकल जोन ‘ बनाने का ऐसा कोई भी प्रस्ताव पास नहीं किया गया है. इस पूरे मामले में अब हजारीबाग की आम जनता खुद को नगर निगम और जिला प्रशासन के बीच की खींचतान में बुरी तरह पिसती हुई महसूस कर रही है.

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सिर्फ पत्राचार से हुई बात, बोर्ड का कोई रोल नहीं
डिप्टी मेयर अविनाश यादव ने फैसला पर प्रक्रिया के परदे के पीछे की पूरी कहानी बयां की. उन्होंने बताया कि पूर्व में नगर निगम की बोर्ड बैठक के दौरान यह विषय प्रस्ताव के रूप में जरूर आया था, जिसे स्वयं मेयर द्वारा लाया गया था. लेकिन, बोर्ड ने इस पर सीधे मुहर लगाने के बजाय दूरदर्शिता दिखाते हुए यह तय किया था कि इस संवेदनशील विषय पर पहले जिला प्रशासन से पत्राचार किया जाए. डिप्टी मेयर ने दो टूक शब्दों में कहा कि ‘नो व्हीकल जोन’ घोषित करना या न करना पूरी तरह से नगर निगम के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है. प्रोसीडिंग का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि निगम ने केवल जिला प्रशासन से इस संदर्भ में विचार-विमर्श के लिए पत्र लिखने की बात कही थी, इसे लागू करने का कोई अंतिम निर्णय बोर्ड स्तर पर कभी नहीं लिया गया. ऐसे में जनता के बीच यह भ्रम फैलाना कि निगम ने इसे पास कर दिया है, पूरी तरह गलत है.

बंद कमरे के बजाय जमीन पर हो फैसला
डिप्टी मेयर अविनाश यादव ने आम जनता के दर्द को अपनी आवाज देते हुए साफ कहा कि उनके व्यक्तिगत विचार से भी झील परिसर को किसी भी कीमत पर ‘नो व्हीकल जोन’ नहीं बनाया जाना चाहिए. उन्होंने दलील दी कि शहर के हजारों लोग सुबह-शाम मानसिक शांति और स्वास्थ्य लाभ के लिए वहां घूमने आते हैं. इसके अलावा, वह मार्ग बेहद व्यस्त है. कई लोगों को वहां से होकर जेल की तरफ जाना होता है, तो कई परिजनों और छात्र-छात्राओं को इंदिरा गांधी स्कूल की तरफ आना-जाना पड़ता है. अगर अचानक से इस पूरे परिसर में वाहनों की एंट्री बैन कर दी जाती है तो आम राहगीरों और स्थानीय नागरिकों को रोजाना भारी दिक्कतों और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ेगा. उन्होंने प्रशासनिक नीतियों पर तीखा तंज कसते हुए सवाल उठाया कि अगर कोई भी नई व्यवस्था बनाने से पहले हम जनता के लिए वैकल्पिक मार्ग या सुचारू पार्किंग का इंतजाम नहीं कर सकते, तो कागजी फरमान जारी करने का क्या फायदा? हम जो भी नीतियां बनाते हैं, वो जनता की सहूलियत के लिए होनी चाहिए, न कि उनकी मुसीबतें बढ़ाने के लिए.
तालमेल की कमी से बेहाल हैं हजारीबाग के नागरिक
इस पूरे घटनाक्रम ने हजारीबाग की उस जमीनी हकीकत को उजागर कर दिया है, जहां कोई भी नया नियम थोपने से पहले स्थानीय जनभावनाओं को टटोलना जरूरी नहीं समझा जाता. वर्तमान स्थिति यह है कि एक तरफ जिला प्रशासन अपने स्तर पर कड़े नियम लागू करने की सुगबुगाहट में है, तो दूसरी तरफ नगर निगम के जनप्रतिनिधि इससे अपना पल्ला झाड़ रहे हैं. इस प्रशासनिक और राजनैतिक रस्साकशी के बीच हजारीबाग की जनता यह समझ नहीं पा रही है कि वे अपनी शिकायत लेकर किसके पास जाएं. स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों का भी कहना है कि अधिकारियों को बंद कमरों में नीतियां बनाने के बजाय सड़क पर आकर जनभावनाओं का आकलन करना चाहिए. फिलहाल, उपमहापौर के इस बड़े और सीधे बयान के बाद अब गेंद जिला प्रशासन के पाले में है, और देखना दिलचस्प होगा कि आम जनता को इस संभावित परेशानी से बचाने के लिए प्रशासन अपने कदम पीछे खींचता है या विवाद को और हवा देता है.
