झारखंड में नाथवाणी का पावर प्ले, प्रस्तावक गुमनाम, समर्थक बेनाम, क्या भाजपा के प्लान-बी से सजेगा ताज

Ranchi: झारखंड की दो राज्यसभा सीटों के लिए लिखी जा रही सियासी स्क्रिप्ट इस बार बड़े-बड़े राजनीतिक गणितज्ञों को अंकगणित भुलाकर शह-मात...

Ranchi: झारखंड की दो राज्यसभा सीटों के लिए लिखी जा रही सियासी स्क्रिप्ट इस बार बड़े-बड़े राजनीतिक गणितज्ञों को अंकगणित भुलाकर शह-मात के खेल पर फोकस करने को मजबूर कर रही है. कहने को तो सीटें सिर्फ दो हैं, लेकिन चुनावी मैदान में 6 फॉर्म बिक चुके हैं. राजनीति का पुराना नियम है कि धुआं वहीं उठता है, जहां आग लगी हो. इस बार झारखंड के सियासी गलियारों में आग लगाने के लिए बाहर से एक ऐसे ‘फायरब्रांड खिलाड़ी’ परिमल नाथवाणी की एंट्री हुई है, जो खेल बनाने और बिगाड़ने दोनों में माहिर माने जाते हैं.

प्रस्तावक और समर्थकों का सस्पेंस, क्या खेल बिगाड़ेंगे नाथवाणी?

नियम के मुताबिक राज्यसभा उम्मीदवार के नामांकन के लिए कम से कम 10 विधायकों का प्रस्तावक के रूप में हस्ताक्षर करना अनिवार्य है. बिना किसी बड़े राजनीतिक दल की मूक सहमति या भीतरघात के, 10 विधायकों को एक मंच पर लाना बेहद मुश्किल माना जाता है. ऐसे में चर्चा तेज है कि आखिर वो कौन से ‘हिडन माननीय’ हैं, जो नाथवाणी का प्रस्तावक बनने के लिए तैयार बैठे हैं.

गौरव वल्लभ का डार्क हॉर्स प्लान और भाजपा की रहस्यमयी चुप्पी

खुद को अनुशासित और दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी कहने वाली भाजपा ने रविवार देर शाम तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं. कहानी में ट्विस्ट तब आया जब भाजपा के डार्क हॉर्स प्लान के तहत गौरव वल्लभ ने गुपचुप तरीके से नामांकन पत्र खरीद लिया, मगर पार्टी की तरफ से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई. सियासी गलियारों में चर्चा है कि भाजपा की यह चुप्पी कोई मजबूरी नहीं, बल्कि उसका सोचा-समझा ‘प्लान-बी’ है.

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स्थानीय का दावा बनाम ‘इनडायरेक्ट सपोर्ट’ का गेम

इससे पहले भाजपा विधायक दल की बैठक में फैसला हुआ था कि पार्टी अपना स्थानीय उम्मीदवार उतारेगी. लेकिन रविवार की शाम ढलने तक किसी नाम का ऐलान नहीं हुआ. अब सियासी गलियारों में यह चर्चा गर्म है कि भाजपा अंदरखाने परिमल नाथवाणी को ‘इनडायरेक्ट’ (अप्रत्यक्ष) समर्थन दे सकती है. राजनीति में जब सीधी उंगली से घी न निकले, तो उंगली टेढ़ी करने की कला में भाजपा को महारत हासिल है, और अधिकृत घोषणा में यह देरी इसी रणनीति का हिस्सा है. अब देखना यह है कि भाजपा का यह मौन व्रत परिमल नाथवाणी के सिर पर ताज सजाता है या झारखंड की राजनीति में कोई नया भूचाल लाता है. फिलहाल, सस्पेंस पूरी तरह बरकरार है.

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