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हजारीबाग में म्यूटेशन के लिए छह महीने भटका युवक, टावर पर चढ़ते ही खुली फाइल, मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के बाद हुआ दाखिल-खारिज

Hazaribagh: कटकमदाग अंचल में जमीन के दाखिल-खारिज को लेकर सामने आए मामले में आखिरकार प्रशासन को कार्रवाई करनी पड़ी. मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप...

Hazaribagh: कटकमदाग अंचल में जमीन के दाखिल-खारिज को लेकर सामने आए मामले में आखिरकार प्रशासन को कार्रवाई करनी पड़ी. मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के बाद युवक की जमीन का म्यूटेशन कर प्रमाण पत्र सौंप दिया गया. हालांकि इस पूरे मामले ने सरकारी व्यवस्था की कार्यशैली और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. चतरा निवासी विकास कुमार अपनी जमीन के दाखिल-खारिज के लिए लगभग छह महीने तक अंचल कार्यालय के चक्कर लगाता रहा. आरोप है कि हर बार उसे किसी न किसी कारण से वापस लौटा दिया जाता था, लेकिन उसके आवेदन पर अंतिम निर्णय नहीं लिया जा रहा था. लगातार उपेक्षा से परेशान होकर युवक ने विरोध का ऐसा तरीका अपनाया जिसने प्रशासनिक महकमे में हलचल मचा दी.

टावर पर चढ़कर जताया विरोध, प्रशासन में मची हलचल

अपनी समस्या के समाधान के लिए विकास कुमार एक मोबाइल टावर पर चढ़ गया और सार्वजनिक रूप से अपनी पीड़ा व्यक्त की. सूचना मिलते ही प्रशासन हरकत में आया और अधिकारियों ने उसे नीचे उतारने का प्रयास शुरू किया. मामला सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों में तेजी से फैल गया, जिसके बाद यह मुख्यमंत्री के संज्ञान में पहुंचा.

मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद तेज हुई कार्रवाई

मुख्यमंत्री ने अपने आधिकारिक X अकाउंट के माध्यम से हजारीबाग उपायुक्त को मामले की जांच कर आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया. इसके बाद प्रशासनिक गतिविधियां तेज हुईं और विकास कुमार को अपर समाहर्ता कार्यालय बुलाकर उसके दस्तावेजों की जांच की गई. जांच के दौरान युवक के सभी भूमि संबंधी दस्तावेज सही पाए गए. इसके बाद जिस दाखिल-खारिज के लिए वह छह महीने से भटक रहा था, उसकी प्रक्रिया पूरी कर दी गई. अंततः कटकमदाग अंचल कार्यालय द्वारा उसे म्यूटेशन का प्रमाण पत्र सौंप दिया गया. मामले में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यदि दस्तावेज सही थे तो आवेदन छह महीने तक लंबित क्यों रखा गया. यदि कोई कमी थी तो उसकी लिखित जानकारी आवेदक को क्यों नहीं दी गई. वहीं यदि यह सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया थी तो मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के बाद ही समाधान क्यों हुआ.

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क्या अब विरोध का यही तरीका बचेगा?

यह घटना एक चिंताजनक संदेश भी देती है. यदि किसी व्यक्ति की वैध मांग पर लंबे समय तक सुनवाई नहीं होती और समाधान तभी मिलता है जब वह अपनी जान जोखिम में डालकर विरोध करता है, तो यह व्यवस्था के लिए गंभीर चेतावनी है. इससे आम लोगों के बीच यह धारणा बन सकती है कि बिना दबाव बनाए उनकी समस्याओं का समाधान नहीं होगा. जब जांच में दस्तावेज सही पाए गए और म्यूटेशन कर दिया गया, तब देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही का प्रश्न और महत्वपूर्ण हो जाता है. क्या संबंधित अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगा जाएगा, क्या विलंब के कारणों की जांच होगी और क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए कोई कार्रवाई की जाएगी, यह देखना बाकी है.

व्यवस्था के सामने खड़ा हुआ बड़ा सवाल

विकास कुमार को आखिरकार न्याय मिल गया, लेकिन इस घटना ने यह उजागर कर दिया कि कई बार आम नागरिक की आवाज फाइलों और दफ्तरों के बीच दब जाती है. जिस काम के लिए छह महीने तक चक्कर लगवाए गए, वही काम उच्च स्तर के हस्तक्षेप के बाद कुछ ही समय में पूरा हो गया. अब लोगों की नजर सरकार और जिला प्रशासन पर है कि वे केवल म्यूटेशन कराकर मामले को समाप्त मानते हैं या फिर देरी के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही भी तय करते हैं.

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