News Wave Desk : बरसात का मौसम आते ही जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों में बांस की नई कोंपलें निकलने लगती हैं. इन्हें स्थानीय भाषा में कई जगह करील या बांस की कोंपल कहा जाता है. झारखंड समेत पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत के कई राज्यों में इसे पारंपरिक खाद्य पदार्थ के रूप में बड़े चाव से खाया जाता है. स्वाद के साथ-साथ यह पोषण से भी भरपूर मानी जाती है. बांस की कोंपल बांस के पौधे का कोमल और नया अंकुर होती है. बाहर से कठोर आवरण वाली यह कोंपल अंदर से सफेद या हल्के पीले रंग की मुलायम होती है. इसका उपयोग सब्जी, अचार, सूप और अन्य पारंपरिक व्यंजनों में किया जाता है.
स्वाद के साथ सेहत का भी खजाना
विशेषज्ञों के अनुसार बांस की कोंपल में फाइबर, पोटैशियम, विटामिन-बी समूह और एंटीऑक्सीडेंट जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं. यह पाचन तंत्र को बेहतर बनाने, वजन नियंत्रित रखने और शरीर को आवश्यक पोषण प्रदान करने में सहायक मानी जाती है. हालांकि, बांस की कच्ची कोंपल का सीधे सेवन नहीं करना चाहिए. इसमें प्राकृतिक रूप से ऐसे यौगिक मौजूद हो सकते हैं जो कच्ची अवस्था में स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकते हैं. इसलिए इसे अच्छी तरह छीलकर उबालने के बाद ही सब्जी या अन्य व्यंजनों में इस्तेमाल किया जाता है. झारखंड के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में बरसात के दौरान बांस की कोंपल की मांग बढ़ जाती है. स्थानीय बाजारों में इसकी बिक्री भी होती है और इसे पारंपरिक भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है. स्वाद और पोषण का अनूठा संगम होने के कारण बांस की कोंपल आज भी लोगों की पसंदीदा मौसमी खाद्य सामग्री बनी हुई है.

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