Click Here
Click Here
Click Here

चुनाव आयोग नहीं, हमारे कार्यकर्ताओं के ‘लहू’ से सींचा गया है बंगाल का कमलः बाबूलाल

Ranchi: नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने कहा है कि कुछ लोग आज भी इस मुगालते में जी रहे हैं कि बंगाल में...

Ranchi: नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने कहा है कि कुछ लोग आज भी इस मुगालते में जी रहे हैं कि बंगाल में भाजपा की सत्ता दिल्ली की मेहरबानी या चुनाव आयोग का गिफ्ट है. सोशल मीडिया पोस्ट में कहा है कि जिन्हें लगता है कि इवीएम की मशीनें, केंद्रीय बल या दिल्ली का दखल भाजपा को सत्ता की दहलीज तक लाया है, वे शायद बंगाल की तासीर से वाकिफ नहीं हैं. सुन लीजिये, बंगाल में कमल बैलेट बॉक्स से पहले कार्यकर्ताओं के खून से खिला है. 15 साल तक खून-पसीना बहाने के बाद, अपनों की लाशें ढोने के बाद और हर जुल्म सहने के बाद आज बंगाल की गलियों से यह हुंकार निकली है. इसे मेहरबानी कहना उन शहीदों का अपमान है जिन्होंने लोकतंत्र को ज़िंदा रखने के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए. यह बंगाल के आत्मसम्मान की जीत है, यह कार्यकर्ताओं के बलिदान की जीत है.

यह भी पढ़ें : हजारीबाग में जल सहिया के जाली हस्ताक्षर से लाखों की निकासी!

लाशों का अंबार और जलते हुए आशियाने

2011 से 2025 तक का सफर कोई राजनीतिक यात्रा नहीं, बल्कि एक महायज्ञ था जिसमें भाजपा कार्यकर्ताओं ने अपने प्राणों की आहुति दी है. यहां लोकतंत्र की बात करने वालों को पेड़ों से लटकाया गया. किसी को बम से उड़ाया गया, तो किसी का शव क्षत-विक्षत हालत में तालाबों में मिला. नंदीग्राम से बीरभूम और कूचबिहार से बशीरहाट तक सिर्फ भाजपा को वोट देने के अपराध में पूरे-पूरे गांव खाक कर दिए गए. वह मंजर याद कीजिए, जब महिलाओं की अस्मत को राजनीतिक हथियार बनाया गया ताकि दहशत पैदा की जा सके. यह सत्ता किसी थाली में परोसकर नहीं मिली, इसके पीछे हाई कोर्ट की फटकार और सीबीआइ जांचों के वो पन्ने हैं जो टीएमसी के खूनी खेल की गवाही देते हैं.

चट्टान जैसा मनोबल: मौत भी जिसे डरा न सकी

बाबूलाल ने आगे लिखा है सोचिए, जिस बूथ अध्यक्ष की लाश सुबह पेड़ पर लटकी मिलती है, दोपहर को उसका बेटा कलेजे पर पत्थर रखकर उसी बूथ पर पोलिंग एजेंट बनकर खड़ा हो जाता है, यह हिम्मत इवीएम से नहीं, स्वाभिमान से आती है. जिस मां का घर जला दिया गया, वह अगले दिन फिर हाथ में भगवा झंडा थामे गलियों में ललकारती है. यह हौसला चुनाव आयोग नहीं देता. वामपंथियों के 34 साल के दमन, तानाशाही और दीदी के 15 साल के खौफनाक, रक्तरंजित दहशतगर्दों की राजनीति को भाजपा के कार्यकर्ताओं ने अपनी छाती पर झेला है. फर्जी मुकदमे, जेल की सलाखें और सामाजिक बहिष्कार भी उनके कदम नहीं डगमगा सके.

यह गिफ्ट नहीं, शहीदों का बलिदान है

जो लोग आज इसे चुनाव आयोग की सेटिंग कहते हैं, वे एक बार उन गुमनाम कब्रों और श्मशानों में जाकर देखें जहां भाजपा का झंडा ओढ़े हमारे भाई सो रहे हैं. उन जले हुए घरों की राख को हाथ लगाकर देखें, जहां आज भी चीखें सुनाई देती हैं. यह जीत उन बेटों के नाम है जिनकी ‘तेरहवीं’ पर उनकी माताओं ने विलाप नहीं किया, बल्कि कसम खाई थी कि जब तक सत्ता परिवर्तन नहीं होगा, लड़ाई जारी रहेगी. यह उन रिलीफ कैंपों में सड़ रहे परिवारों के सब्र की जीत है.बंगाल में सत्ता किसी मशीन ने नहीं दी है. यहां हर एक वोट के पीछे एक शहादत छिपी है.

यह भी पढ़ें : ‘नशा मुक्ति’ दावों को ठेंगा दिखा रही हकीकत, हाथों में किताब की जगह खैनी मल रहे नौनिहाल

शून्य से शिखर तक का रक्तरंजित सफर

• 2011: सिर्फ 1 विधायक (मजाक उड़ाया गया)
• 2016: 3 विधायक (संघर्ष की शुरुआत)
• 2019: 18 सांसद (ममता के गढ़ में सेंध)
• 2021: 77 विधायक (मुख्य विपक्ष की ताकत)
• 2024: 12 सीटें (भयंकर दमन के बावजूद टिके रहे)
• 2026: पूर्ण बहुमत की प्रचंड विजय

add1
सम्बंधित ख़बरें

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *