Saraikela: चांडिल अनुमंडल क्षेत्र के दालगाम गाँव में प्रतिवर्ष की तरह इस वर्ष भी चैत्र पर्व धूमधाम से मनाया गया. रात्रि जागरण में पारंपरिक छऊ नृत्य का आयोजन हुआ. इसके बाद सोमवार सुबह चड़क पूजा-अर्चना के साथ ‘भोगता घूरा’ अनुष्ठान चलता रहा.

परंपरा और मान्यता का निर्वहन
मान्यता के अनुसार, मन्नत पूरी होने पर भक्त उपवास रखकर पीठ पर अंकुश से छेद कराते हैं और हुक में लटककर चड़क खंभे पर घुमाए जाते हैं. यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है. ग्रामीणों का कहना है कि चड़क पूजा चैत्र संक्रांति से शुरू होकर जेठ संक्रांति तक विभिन्न स्थानों पर होती है. पूजा की शुरुआत ‘पाठ भोक्ता’ के साथ होती है.
भगवान शिव को समर्पित अनुष्ठान
सनातन परंपरा में यह अनुष्ठान भगवान शिव को समर्पित माना जाता है. भक्तों का विश्वास है कि महादेव की कृपा से जीवन में बड़े संकट दूर होते हैं.
अनुष्ठान की विशेष परंपराएं
अनुष्ठान के दौरान पत्नी ‘भगतां ढांग’ के नीचे माथे पर कलश लेकर खड़ी रहती है. पति के कुशलपूर्वक नीचे उतरने के बाद वह उसे जल और लड्डू खिलाती है.
घाव पर सिंदूर लगाने की मान्यता
मंदिर प्रांगण में पीठ छिदवाने के दौरान घाव पर सिंदूर लगाया जाता है. स्थानीय मान्यता है कि इससे घाव जल्दी भर जाते हैं और डॉक्टर की जरूरत नहीं पड़ती. सुबह से शाम तक चड़क पूजा का क्रम चलता रहा.
श्रद्धालुओं की उमड़ी भीड़
इस प्राचीन परंपरा को देखने आसपास के गाँवों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे.
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