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‘संदिग्ध कुर्फानामा और 12 वर्ष का वैध कब्जा साबित किए बिना भूमि पर दावा स्वीकार नहीं’ : Jharkhand HC

Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने संथाल परगना टेनेंसी (SPT Act) एक्ट से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल पुराने...

jharkhand high court
Assistant teacher Recruitment: High Court hears arguments on normalization dispute

Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने संथाल परगना टेनेंसी (SPT Act) एक्ट से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल पुराने कुर्फानामा के आधार पर भूमि पर अधिकार का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता. यदि संबंधित व्यक्ति यह साबित नहीं कर सके कि SPT Act, 1949 के प्रावधानों के अनुरूप उसका 12 वर्ष का वैध कब्जा था, तो उसे भूमि पर अधिकार या संरक्षण नहीं मिल सकता.

बेनी माधव झा की याचिका खारिज

न्यायमूर्ति संजय कुमार द्विवेदी की अदालत ने गोड्डा निवासी बेनी माधव झा की याचिका खारिज करते हुए कहा कि जिस कुर्फानामा के आधार पर याचिकाकर्ता भूमि पर अपना दावा कर रहा है, वह प्रथम दृष्टया संदिग्ध (Collusive) प्रतीत होता है तथा SPT Act की नियमावली में निर्धारित आवश्यक शर्तों को पूरा नहीं करता.

प्रतिवादी ने जताया विरोध

मामले में याचिकाकर्ता ने संथाल परगना प्रमंडल के आयुक्त द्वारा पारित उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें डिप्टी कमिश्नर के पक्ष में दिए गए आदेश को पलटते हुए एसडीओ के बेदखली आदेश को बहाल कर दिया गया था. याचिकाकर्ता का दावा था कि उसके पिता वर्ष 1941 के कुर्फानामा के आधार पर वर्षों से भूमि पर काबिज थे, जबकि प्रतिवादी ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि कथित कुर्फानामा अवैध और मिलीभगत से तैयार किया गया दस्तावेज है.

हाईकोर्ट ने कहा कि निर्धारित शर्तों का करना होगा पालन

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि SPT Act लागू होने के बाद भूमि पर अधिकार बनाए रखने के लिए कानून में निर्धारित शर्तों का पालन आवश्यक है. अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सका कि अधिनियम लागू होने से पहले या उसके अनुरूप 12 वर्ष का वैध कब्जा था. साथ ही, प्रस्तुत कुर्फानामा न तो नियमावली के अनुरूप प्रमाणित था और न ही उसकी वैधता स्थापित हो सकी.

SPT Act का उद्देश्य

अदालत ने अपने फैसले में यह भी दोहराया कि SPT Act का उद्देश्य संथाल परगना की रैयती भूमि को अवैध और छिपे हुए हस्तांतरण से बचाना है. ऐसे मामलों में मिलीभगत से किए गए समझौते या संदिग्ध दस्तावेजों के आधार पर भूमि हस्तांतरण को वैध नहीं माना जा सकता. इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि प्रमंडलीय आयुक्त का आदेश विधिसम्मत है और उसमें किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि नहीं है. इसी आधार पर याचिका खारिज कर दी गई.

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