Saraikela: सरायकेला-खरसावां जिले के कुकड़ू प्रखंड स्थित पारगामा पंचायत का हाईतीरूल गांव आज भी शुद्ध पेयजल की सुविधा से वंचित है. आदिवासी बहुल इस गांव की महिलाएं रोज 2 से 4 किलोमीटर पैदल चलकर पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले से पानी लाने को मजबूर हैं. गांव में न हैंडपंप है, न जलमीनार और न ही नल-जल योजना की सुविधा उपलब्ध है.
हाईतीरूल गांव में अधिकांश आदिवासी परिवार रहते हैं. गर्मी हो या बरसात, महिलाएं रोज सुबह-शाम जंगल, झाड़ियों और खेतों की मेड़ से होकर 2 से 4 किलोमीटर पैदल चलकर पानी लाने जाती हैं.

पश्चिम बंगाल से लाना पड़ता है पानी
पानी के लिए ग्रामीणों को पश्चिम बंगाल की सीमा पार कर पुरुलिया जिले के बागमुंडी थाना क्षेत्र के माठा अंचल स्थित चड़क पाथर गांव जाना पड़ता है. वहां डाढ़ी, चुआं, डोभा और पुराने कूप से पानी भरकर महिलाएं डेगची और हांडी सिर पर रखकर गांव लौटती हैं.
ग्रामीण महिलाओं का कहना है, “रास्ते में हाथियों का झुंड, सांप और बिच्छू मिलने का खतरा बना रहता है. कांटों भरे जंगल से होकर गुजरना पड़ता है. मजबूरी में यही पानी लाकर कपड़े से छानकर पीने और खाना बनाने में इस्तेमाल करते हैं. सालभर यही स्थिति रहती है.”
पेयजल की स्थायी व्यवस्था नहीं
ग्रामीणों का कहना है कि पहाड़ियों के बीच बसे इस गांव तक अब तक जल जीवन मिशन और हर घर नल से जल योजना का लाभ नहीं पहुंचा है. गांव में शुद्ध पेयजल की स्थायी व्यवस्था नहीं होने से लोगों को रोजाना कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है. सिर्फ लोगों को ही नहीं, पालतू मवेशियों के लिए भी कई किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ता है. यह इलाका हाथी प्रभावित क्षेत्र है, जिससे पानी लाने के दौरान हमेशा खतरा बना रहता है.
ग्रामीणों ने प्रशासन से की मांग
ग्रामीणों ने प्रशासन से गांव में चापाकल, जलमीनार अथवा नल-जल योजना के तहत शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने की मांग की है. उनका कहना है कि गांव में जल्द पेयजल की स्थायी व्यवस्था की जाए, ताकि लोगों को दूसरे राज्य से पानी लाने की मजबूरी खत्म हो सके.


