Hazaribagh: नगर निगम की नाक के नीचे शहर की सड़कों पर मौत का एक ऐसा ही ढांचा सरेआम घूम रहा है, जो कभी भी किसी राहगीर की जिंदगी को लील सकता है. सुबह से हो रही बारिश के बीच आरोग्यं हॉस्पिटल के समीप उस वक्त चीख-पुकार मच जाती, अगर चंद सेकंड का फासला और किस्मत ने साथ न दिया होता. अस्पताल के ठीक सामने लगा एक विशालकाय और भारी-भरकम लोहे का विज्ञापन यूनिपोल अचानक भरभराकर बीच सड़क पर गिर गया. जिस वक्त यह हादसा हुआ, उस समय इलाके में तेज बारिश हो रही थी. बारिश से बचने के लिए एक ऑटो ठीक उसी यूनिपोल के नीचे खड़ा था, जिसमें तीन सवारियां बैठी हुई थीं. गनीमत यह रही कि हादसे से ठीक दो सेकंड पहले ऑटो चालक ने गाड़ी आगे बढ़ा दी और जैसे ही ऑटो आगे खिसका, वह भारी-भरकम लोहे का स्ट्रक्चर सीधे उसी जगह पर आ गिरा. ऑटो में बैठी तीनों सवारियों और चालक की किस्मत अच्छी थी कि वे मौत के मुंह से बाल-बाल बच गए, वरना रविवार को हजारीबाग एक बड़े सामूहिक हत्याकांड का गवाह बन जाता.
लोहे का ढांचा पूरी तरह सड़ चुका था
इस हादसे के बाद मौक़े पर जुटे लोगों ने बताया कि विशालकाय होर्डिंग का जो मुख्य पिलर था, उसका लोहा भीतर से पूरी तरह सड़कर खोखला हो चुका था. जंग लगे उस लोहे को देखकर कोई भी कह सकता है कि यह ढांचा महीनों से गिरने की कगार पर था. यहाँ सबसे बड़ा और गंभीर सवाल नगर निगम और संबंधित विज्ञापन एजेंसी पर खड़ा होता है. यह सिर्फ एक तकनीकी लापरवाही नहीं है, बल्कि यह सीधे-सीधे एक बड़े ‘होर्डिंग घोटाले’ की ओर इशारा करता है. नगर निगम पूरे शहर में बैनर और होर्डिंग लगाने के नाम पर निजी एजेंसियों और कंपनियों से हर साल लाखों-करोड़ों रुपए का टैक्स वसूलता है. शहर के हर मुख्य चौराहे, हर टर्न और बिजली के पोल पर विज्ञापनों की बाढ़ आई हुई है. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि टैक्स की मोटी मलाई खाने वाला नगर निगम और मोटी कमाई करने वाली एजेंसियां क्या इन लोहे के स्ट्रक्चर्स की फिटनेस की कभी जांच करती हैं? क्या सिर्फ पैसे उगाहना ही निगम का काम रह गया है, जनता की जान की कोई कीमत नहीं है?

मटवारी, इंद्रपुरी और झंडा चौक पर गिरे ऐसे यूनिपोल
आरोग्यं अस्पताल के पास तो लोगों की किस्मत अच्छी थी, लेकिन अगर यही जर्जर और सड़ा हुआ यूनिपोल शहर के सबसे भीड़भाड़ वाले इलाकों जैसे मटवारी, इंद्रपुरी चौक, झंडा चौक या अनदा चौक पर गिर जाए, तो क्या होगा? इन इलाकों में दिन-रात हजारों लोगों और स्कूली बच्चों की आवाजाही लगी रहती है. अगर पीक ऑवर में ऐसा कोई हादसा मुख्य बाजार में घट जाए, तो न जाने कितनी मां की गोद सूनी हो जाएगी और कितने हंसते-खेलते परिवार उजड़ जाएंगे. शहर के तमाम मुख्य चौराहों पर लगे ये ऊंचे-ऊंचे होर्डिंग्स आज विज्ञापन कम और आम नागरिकों के सिर पर लटकती हुई मौत की तलवार ज्यादा नजर आ रहे हैं.
कौन लेगा लाशों की जिम्मेदारी?
इस घटना के बाद हजारीबाग के सजग नागरिकों का गुस्सा सातवें आसमान पर है. स्थानीय लोगों ने नगर निगम प्रशासन और जिला प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए मांग की है कि किसी बड़ी और खूनी दुर्घटना के होने का इंतजार किए बिना, शहर में लगे सभी यूनिपोल और होर्डिंग्स की तत्काल प्रभाव से सुरक्षा जांच कराई जाए. जितने भी जर्जर, जंग लगे और क्षतिग्रस्त लोहे के स्ट्रक्चर हैं, उन्हें चौबीस घंटे के भीतर चिन्हित करके क्रेन के जरिए हटाया जाए. अब देखना यह है कि शराब दुकानों और होटलों पर त्वरित कार्रवाई करने वाला प्रशासन शहर के इस वीआईपी इलाके में हुए हादसे के बाद कुंभकर्णी नींद से जागता है या फिर किसी मासूम की मौत के बाद ही फाइलों को आगे बढ़ाया जाएगा.
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