Vinit Abha Upadhyay
Ranchi : झारखंड हाईकोर्ट ने मध्यस्थता और सुलह अधिनियम के तहत एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि मध्यस्थ की नियुक्ति के लिए रेफरल कोर्ट को केवल पहली नजर में यह देखना होता है कि पक्षों के बीच मध्यस्थता समझौता मौजूद है या नहीं. कोर्ट सीमा, विचारणीयता या दिवाला कार्यवाही से जुड़े विवादित मुद्दों की गहराई में नहीं जा सकता. हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस एम.एस. सोनक की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए हिंदुस्तान डोर-ओलिवर लिमिटेड HDOL और यूरेनियम कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड UCIL के बीच विवाद के निपटारे के लिए आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस सी. प्रवीन कुमार को एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त किया है. कोर्ट ने UCIL द्वारा उठाई गई सभी आपत्तियों को मध्यस्थ न्यायाधिकरण के समक्ष विचार के लिए खुला छोड़ दिया है.

मार्च 2009 से जुड़ा है विवाद
यह विवाद 20 मार्च 2009 को हुए एक कॉन्ट्रेक्ट से जुड़ा है. जिसके तहत HDOL को सार्वजनिक क्षेत्र की यूरेनियम खनन कंपनी UCIL के लिए कुछ काम करने थे. HDOL ने समझौते के तहत मध्यस्थता क्लॉज का हवाला देते हुए अपने दावों को मध्यस्थता के पास भेजने की मांग की. जिसके बाद UCIL ने इस अनुरोध को खारिज कर दिया. UCIL का तर्क था कि यह कॉन्ट्रेक्ट काफी पुराना हो चुका है और दावे विचारणीय नहीं हैं. इसके साथ ही UCIL ने यह भी दलील दी कि HDOL दिवाला कार्यवाही से गुजर चुकी है और बाद में इसे पैन इंडिया ट्यूब्स प्राइवेट लिमिटेड को बेच दिया गया था. इसलिए मध्यस्थता का अनुरोध कानूनी रूप से सही नहीं है.
UCIL के इनकार के बाद भ्क्व्स् ने मध्यस्थ की नियुक्ति के लिए झारखंड हाईकोर्ट का रुख किया था. इस मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता समझौते का होना निर्विवाद था. अदालत ने कहा कि समय-सीमा, विचारणीयता और दिवाला कार्यवाही के परिणामों से जुड़ी आपत्तियों के लिए गहन जांच की आवश्यकता है इसलिए ये ऐसे मामले हैं जिन पर मध्यस्थ न्यायाधिकरण के गठन के बाद ही विचार किया जाना चाहिए.
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