विनीत आभा उपाध्याय
Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने सरकारी निविदा (टेंडर) प्रक्रिया को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा है कि राज्य सरकार या उसके अधीन काम करने वाली एजेंसियां टेंडर प्रक्रिया के दौरान अपनी शक्तियों का उपयोग निरंकुश तरीके से नहीं कर सकतीं.
टेंडर शर्तें केवल औपचारिकता नहीं, कानूनी बाध्यता
हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि निविदा सूचना (NIT) में अंकित शर्तें केवल औपचारिकता नहीं हैं बल्कि वे एक कानूनी प्रतिबद्धता हैं और प्रशासन को प्राप्त विवेकाधिकार का दायरा कानून के दायरे से बाहर नहीं है. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि राज्य सरकार के पास टेंडर के मामलों में असीमित शक्ति नहीं है.
शर्तों में बदलाव के लिए देना होगा ठोस कारण
यदि सरकार टेंडर की शर्तों से विचलित होना चाहती है तो उसे यह साबित करना होगा कि ऐसा करना सार्वजनिक हित में अनिवार्य था और इसके पीछे पर्याप्त तर्कसंगत कारण मौजूद हैं. बिना लिखित कारण के शर्तों में बदलाव को अदालत ने मनमाना करार दिया.
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समान अवसर और पारदर्शिता पर जोर
कोर्ट ने अपने फैसले में समानता के अधिकार को आधार बनाया. अदालत ने तर्क दिया कि जब सरकार एक टेंडर जारी करता है तो वह टेंडर प्रक्रिया में शामिल होने वाले सभी बीडर्स (बोलीदाताओं) को एक बराबर मौका देने का वादा करता है. लेकिन अगर चयन प्रक्रिया के दौरान शर्तों को बदला जाता है तो यह न केवल पारदर्शिता का उल्लंघन है बल्कि उन कंपनियों के साथ अन्याय है जिन्होंने मूल शर्तों के आधार पर अपनी बोलियां जमा की थीं.
