Ravi Bharti
Ranchi : झारखंड की सियासत में जब तक ट्विस्ट और टर्न न हो, तब तक यहां के राजनीतिक सूरमाओं को कुछ भी नहीं पचता. दो सीटों के लिए होने वाले राज्यसभा चुनाव का रणक्षेत्र अब त्रिकोणीय हो चुका है. मुकाबला सीधा नहीं, बल्कि टेढ़ा है और इस टेढ़ेपन में पावर गेम का ऐसा तड़का लगा है कि बड़े-बड़े दिग्गजों के पसीने छूट रहे हैं. मैदान में तीन महारथी हैं. झामुमो से बैजनाथ राम, कांग्रेस से प्रणव झा, और निर्दलीय परिमल नाथवानी. सीट दो, दावेदार तीन, यानी खेल तो होना तय है. लेकिन असली मजा इस बार नेताओं के भाषणों में नहीं, बल्कि पोलिंग बूथ के अंदर दिखाने और छिपाने’ के उस अदृश्य खेल में है. जिसे कानून की भाषा में ओपन बैलेट सिस्टम कहते हैं. 18 जून को जब वोटिंग की पर्चियां खुलेंगी, तब पता चलेगा कि किसने वफादारी की कसम खाई थी और किसने ‘अंदरूनी सेटिंग’ का हलवा खाया था.

राज्यसभा चुनाव किसी रियलिटी शो से कम नहीं
राज्यसभा का यह चुनाव किसी रियलिटी शो से कम नहीं है. जहां ‘सीक्रेट’ कुछ भी नहीं होता. बशर्ते आप अपनी ही पार्टी के हो. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 59 के तहत हर दलीय विधायक को अपना वोट मतपेटी में गिराने से पहले अपनी पार्टी के अधिकृत पोलिंग एजेंट को दिखाना अनिवार्य है. अगर विधायक जी ने अपनी पार्टी के एजेंट को बैलेट पेपर नहीं दिखाया, तो उनका वोट तुरंत ‘अमान्य घोषित कर दिया जाएगा. अगर गलती से या जानबूझकर अपना बैलेट पेपर किसी दूसरी पार्टी के एजेंट या बाहरी व्यक्ति को दिखा दिया, तब भी वोट कबाड़ में चला जाएगा. लेकिन निर्दलीय विधायकों पर यह बंदिश नहीं है. वे अपनी मर्जी के मालिक हैं, जहां चाहें दिल वहां वोट दें.
पोलिंग एजेंट जिसकी आवभगत है लाजमी
इस पूरे त्रिकोणीय मुकाबले में अगर कोई सबसे पावरफुल बनकर उभरा है, तो वह हैं राजनीतिक दलों के अधिकृत पोलिंग एजेंट. आज की तारीख में इन एजेंटों की इंटीग्रिटी शेयर बाजार के सूचकांक से भी ज्यादा संवेदनशील हो चुकी है. सारा दारोमदार इन्हीं कंधों पर टिका है. नियम कहता है कि विधायक को अपना वोट एजेंट को दिखाना है. लेकिन नियम यह कहीं नहीं कहता कि अगर विधायक ने क्रॉस वोटिंग (पार्टी लाइन से अलग जाकर किसी और को वोट) कर दी, और फिर भी एजेंट को बैलेट पेपर दिखा दिया, तो उसका वोट रद्द हो जाएगा. ऐसा नहीं है, वोट बिल्कुल वैध रहेगा. कानून की नजर में विधायक ने दिखाने का फर्ज पूरा कर दिया.
अंदरूनी सेटिंग का पुराना इतिहास
झारखंड का राजनीतिक इतिहास गवाह है कि यहां के विधायकों और पोलिंग एजेंटों के बीच का तालमेल इतना बेहतरीन होता है कि बड़े-बड़े जासूस भी फेल हो जाएं. अतीत में माले, कांग्रेस और अन्य दलों के माननीय विधायकों ने अपनी अंतरात्मा की आवाज पर जमकर क्रॉस वोटिंग की. नियम के मुताबिक उन्होंने पोलिंग एजेंट को बैलेट पेपर दिखाया भी. लेकिन एजेंट ने उस समय अपनी आंखें इस तरह भक्ति भाव से मूंद ली या अपनी वफादारी का चश्मा ऐसा बदला कि क्रॉस वोटिंग करने वाले की पहचान ही धुंधली हो गई. बाद में अगर थोड़ी-बहुत पहचान हुई भी, तो अपनो पर कार्रवाई कौन करें? मामला ठंडे बस्ते में चला गया. इस बार भी डर इसी बात का है कि कहीं एजेंट और विधायक की जुगलबंदी पार्टी के मंसूबों पर पानी न फेर दे.
कांग्रेस बनाम निर्दलीय
झामुमो के बैजनाथ राम अपनी गोटियां सेट मानकर चल रहे हैं, लेकिन असली सर दर्द तो कांग्रेस के प्रणव झा और निर्दलीय परिमल नाथवानी के बीच है. कांग्रेस के सामने अपनी साख बचाने की चुनौती है. तो दूसरी तरफ धनबल और प्रबंधन के उस्ताद माने जाने वाले निर्दलीय खिलाड़ी का चक्रव्यूह है. इस त्रिकोणीय मुकाबले में कांग्रेस को अपने विधायकों को एकजुट रखना है और यह सुनिश्चित करना है कि उनके पोलिंग एजेंट की आंखें 18 जून को पूरी तरह खुली रहें. वहीं, निर्दलीय खेमे की नजरें उसी अंदरूनी सहमति और ग्रे एरिया पर टिकी हैं. जहां वोट भी पड़ जाए, एजेंट देख भी ले, और बाहर आकर कह दे, सब ठीक है, अपने ही खाते में गया है.
18 जून को फटेगा वफादारी का गुब्बारा
18 जून को पिक्चर पूरी तरह क्लियर हो जाएगी. देखना दिलचस्प होगा कि इस बार पोलिंग एजेंट अपनी पार्टी के चौकीदार बनते हैं या फिर पार्टनर. बहरहाल, जब तक वोटिंग मशीन और बैलेट बॉक्स सील नहीं हो जाते, तब तक रांची के सियासी गलियारों में हर शाम एक ही सवाल गूंजेगा, दिखाओगे तो सही, पर दिखाओगे क्या.
