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खुशी पाठक हत्याकांड. एंबुलेंस मुहैया कराने वाला अस्पताल संचालक अब तक फरार, पुलिस की जांच पर उठे सवाल

Ranchi: राजधानी रांची के रातू थाना क्षेत्र में मार्च महीने में नाबालिग बच्ची खुशी पाठक की निर्मम हत्या का मामला सामने आया...

Ranchi: राजधानी रांची के रातू थाना क्षेत्र में मार्च महीने में नाबालिग बच्ची खुशी पाठक की निर्मम हत्या का मामला सामने आया था. हत्या के बाद बच्ची के शव को बिहार के गया जी ले जाकर अंतिम संस्कार किया गया था. अंतिम संस्कार के बाद घर में विधिवत पूजा-पाठ भी कराया गया था. इस मामले में मुख्य आरोपी सुबोध पाठक और उसके बेटे को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है.

वहीं, शव को ठिकाने लगाने में अहम भूमिका निभाने वाले कमलेश पाठक की भूमिका भी सामने आई है. कमलेश पाठक रातू इलाके में एक अस्पताल संचालित करता है. आरोप है कि उसी ने सुबोध पाठक को एंबुलेंस उपलब्ध कराई थी, जिसके जरिए शव को गया जी ले जाकर अंतिम संस्कार किया गया.

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तीन महीने बाद भी आरोपी फरार, पुलिस पर सवाल

घटना के तीन महीने बीत जाने के बावजूद एंबुलेंस उपलब्ध कराने वाले कमलेश पाठक के बारे में पुलिस अब तक कोई ठोस जानकारी नहीं जुटा पाई है. उसकी गिरफ्तारी भी अब तक नहीं हो सकी है. फिलहाल वह फरार बताया जा रहा है, जबकि उसका अस्पताल सामान्य रूप से संचालित हो रहा है. सवाल यह भी उठ रहा है कि यह अस्पताल किसकी मिलीभगत से चल रहा है. मार्च महीने में हत्या के बाद सुबोध पाठक और उसके बेटे ने कमलेश पाठक से संपर्क कर मदद मांगी थी. इसके बाद एंबुलेंस की व्यवस्था की गई और शव को ठिकाने लगाया गया.

कोर्ट से वारंट के बाद होगी कुर्की-जब्ती

इस मामले में रांची पुलिस का कहना है कि फरार कमलेश पाठक की तलाश की जा रही है. कोर्ट से वारंट जारी होने के बाद उसके घर की कुर्की-जब्ती की कार्रवाई की जाएगी. फिलहाल पुलिस अपने स्तर से जांच में जुटी है. बताया जाता है कि शव के अंतिम संस्कार के तीन दिन बाद वापस लौटकर आरोपियों ने बच्ची की आत्मा की शांति के लिए बनारस से पंडित बुलाकर घर में गरुड़ पुराण का पाठ कराया, ताकि किसी को शक न हो.

मृतक बच्ची राजनंदिनी मूल रूप से औरंगाबाद जिले के अंबा गांव निवासी दिनेश मइवार की दूसरी पत्नी की पुत्री थी. दिनेश मइवार शारीरिक रूप से दिव्यांग हैं और उनकी आर्थिक स्थिति भी कमजोर बताई जाती है. इसी कारण परिचित सुबोध पाठक उसे अपने साथ रांची ले आया था, ताकि उसका बेहतर पालन-पोषण हो सके.

पिछले करीब आठ वर्षों से राजनंदिनी सुबोध पाठक के घर में रह रही थी और उन्हें फूफा कहकर संबोधित करती थी. बताया जाता है कि सुबोध पाठक ने उसके आधार कार्ड में भी पिता के स्थान पर अपना नाम दर्ज करा रखा था. धीरे-धीरे वह उसी परिवार को अपना असली परिवार मानने लगी थी, लेकिन अंततः इसी परिवार ने उसके साथ यह अमानवीय अपराध किया.

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