Ranchi: सुप्रीम कोर्ट ने पैतृक संपत्ति के अधिकारों को लेकर एक ऐतिहासिक और दूरगामी फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया है कि कोई भी व्यक्ति अपने हिस्से की विरासत में मिली खेती की जमीन को परिवार के अन्य कानूनी वारिसों (भाई-बहनों) की सहमति या उन्हें ऑफर दिए बिना किसी बाहरी व्यक्ति को सीधे नहीं बेच सकता.
कानूनी प्रावधान और प्राथमिकता का अधिकार
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिस्वर सिंह की पीठ ने स्पष्ट किया, कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 22 के तहत मिलने वाला प्राथमिकता का अधिकार कृषि भूमि पर भी पूरी तरह लागू होता है. कानूनन, यदि कोई सह-वारिस अपनी जमीन बेचना चाहता है, तो उसे सबसे पहले अपने ही भाई-बहनों या क्लास- वन के अन्य उत्तराधिकारियों को इसे खरीदने का पहला मौका देना होगा.
जमीन विवादों पर लगेगा अंकुश
इस फैसले से ग्रामीण इलाकों में जमीन को लेकर होने वाले पारिवारिक झगड़ों और धोखाधड़ी पर काफी हद तक लगाम लगेगी. कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया, कि पैतृक संपत्ति को यथासंभव परिवार के भीतर ही सुरक्षित रखना था. इसलिए बाहरी खरीदार को जमीन रजिस्ट्री करने से पहले सह-उत्तराधिकारियों की राय और उनकी हिस्सेदारी का सम्मान करना अब अनिवार्य होगा.
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