NewsWave Desk : क्या आपने कभी गौर किया है कि दुनिया की बड़ी से बड़ी वॉच कंपनियां जब अपनी कीमती घड़ियों का विज्ञापन करती हैं, तो समय हमेशा 10 बजकर 10 मिनट ही क्यों सेट रहता है. पहली नजर में यह महज एक इत्तेफाक लग सकता है, लेकिन सच यह है कि समय का यह चक्र आपके दिमाग को प्रभावित करने के लिए बेहद सलीके से बुना गया एक साइकोलॉजिकल और कॉर्पोरेट जाल है. इसके पीछे डिजाइन से लेकर न्यूरो-मार्केटिंग के कई दिलचस्प रहस्य छिपे है.
चेहरे पर खिंच जाती है एक प्यारी सी मुस्कान
मनोवैज्ञानिकों और घड़ी विशेषज्ञों की मानें तो 10:10 का समय घड़ी के डायल को एक ‘स्माइलिंग फेस’ (मुस्कुराता हुआ चेहरा) देता है. जब सुइयां 10 और 2 पर होती है, तो वे नीचे की तरफ एक घुमावदार कर्व बनाती है, जो मानवीय चेहरे की मुस्कान जैसा दिखता है. बिना कुछ कहे यह ‘सबलिमिनल मैसेज’ (अचेतन संदेश) सीधे उपभोक्ता के दिमाग पर सकारात्मक असर डालता है और उन्हें घड़ी खरीदने के लिए प्रेरित करता है.
ब्रैंड लोगो को मिलता है शाही फ्रेम
कमर्शियल नजरिए से देखें तो घड़ी निर्माता कंपनियां अपना ब्रैंड नेम या लोगो हमेशा 12 बजे के ठीक नीचे लगाती है. 10 बजकर 10 मिनट पर सुइयां इस तरह फैलती है कि वे लोगो को छुपाने के बजाय उसे दोनों तरफ से एक खूबसूरत वी-शेप फ्रेम देती है. इससे ग्राहकों की नजर सबसे पहले कंपनी के नाम पर जाती है. साथ ही, घड़ी के अन्य फीचर्स जैसे डेट विंडो या छोटे क्रोनोग्राफ डायल भी बिल्कुल साफ नजर आते है.
8:20 के नैगेटिव एंगल को ऐसे बदला
दिलचस्प बात यह है कि शुरुआती दौर में कुछ कंपनियां सुइयों को 8 बजकर 20 मिनट पर भी सेट करती थी. हालांकि, बाद में इस पर रोक लगा दी गई क्योंकि 8:20 की स्थिति देखने में उदास या रोते हुए चेहरे जैसी लगती थी. मार्केटिंग गुरुओं ने महसूस किया कि नकारात्मक दिखने वाली चीज बिक्री घटा सकती है. इसलिए हैप्पी फेस और विक्ट्री का अहसास कराने वाले 10:10 के टाइम को पूरी दुनिया ने अपना यूनिवर्सल स्टैंडर्ड बना लिया.
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