Ranchi: झारखंड के युवाओं के सपनों की उड़ान अब राज्य की सीमाओं को लांघकर दूसरे राज्यों के खजाने भर रही है. हर साल मैट्रिक और इंटरमीडिएट के बाद झारखंड से हजारों छात्र बेहतर शिक्षा, प्लेसमेंट और कैंपस लाइफ की तलाश में कर्नाटक, तमिलनाडु, दिल्ली, महाराष्ट्र और ओडिशा जैसे राज्यों का रुख कर रहे हैं. चौंकाने वाली बात यह है कि शिक्षा के नाम पर झारखंड का लगभग 300 से 400 करोड़ रुपया हर साल राज्य से बाहर दूसरे प्रदेशों के शिक्षण संस्थानों की झोली में जा रहा है. झारखंड से होने वाला यह पलायन केवल शैक्षणिक नहीं, बल्कि गंभीर रूप से आर्थिक भी है. इसमें फीस, हॉस्टल और रहने के खर्च भी शामिल है.
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हर साल लाखों की रवानगी
शिक्षा विशेषज्ञों और विभिन्न प्रवेश परीक्षाओं के डेटा के अनुसार, झारखंड से हर साल लगभग 1.5 लाख से 2 लाख छात्र उच्च शिक्षा के लिए दूसरे राज्यों में जाते हैं.
• इंजीनियरिंग और मेडिकल: लगभग 40 फीसदी छात्र तकनीकी और चिकित्सा शिक्षा के लिए दक्षिण भारत (बेंगलुरु, चेन्नई) और राजस्थान (कोटा) का रुख करते हैं.
• सामान्य स्नातक (यूजी/पीजी ): दिल्ली विश्वविद्यालय, बीएचयू और पुणे जैसे केंद्रों में राज्य के करीब 30 फीसदी छात्र नामांकन लेते हैं.
• मैनेजमेंट और प्रोफेशनल कोर्सेज: लगभग 20फीसदी छात्र व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के लिए महानगरों की ओर पलायन करते हैं.
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आखिर क्यों खाली हो रहा झारखंड?
सीटों की भारी कमी: झारखंड के सरकारी विश्वविद्यालयों में सीटों की संख्या आवेदकों की तुलना में बेहद कम है.
सत्रों का विलंबः राज्य के कई विश्वविद्यालयों में परीक्षा और रिजल्ट का सत्र 6 महीने से लेकर एक साल तक देरी से चलता है.
प्लेसमेंट का अभाव: राज्य के शिक्षण संस्थानों में औद्योगिक कनेक्शन की कमी के कारण छात्रों को कैंपस सिलेक्शन का लाभ नहीं मिल पाता.
गुणवत्ता और आधुनिक कोर्सेज: डेटा साइंस, एआई, और न्यू-एज मैनेजमेंट जैसे कोर्सेज के लिए झारखंड में गिने-चुने संस्थान ही उपलब्ध.
किस राज्य में किसी पढ़ाई और तैयारी के लिए जाते हैं छात्र
• कर्नाटक (बेंगलुरु)–इंजीनियरिंग, मेडिकल, मैनेजमेंट
• दिल्ली-एनसीआर- दिल्ली यूनिवर्सिटी, कोचिंग, लॉ
• ओडिसा(भुवनेश्वर)-बीटेक, मैनेजमेंट, जनरल कोर्सेज
• महाराष्ट्र (पुणे-मुंबई)- आर्ट्स, कॉमर्स, डिजाइन
• राजस्थान (कोटा)- मेडिकल व इंजीनियरिंग कोचिंग
