Ranchi : झारखंड सहकारी समितियों के ताजा आंकड़े कई अहम संकेत दे रहे हैं. राजधानी रांची समितियों की संख्या के मामले में पावर हाउस बनकर उभरी है, जहां सबसे ज्यादा 2,076 समितियां यानी कुल का 17.13 प्रतिशत सक्रिय हैं. वहीं पूर्वी सिंहभूम ने सदस्य भागीदारी में बाजी मार ली है, जहां 605 समितियों के साथ 3.35 लाख से अधिक सदस्य जुड़े हैं, जो राज्य में सबसे ज्यादा है. इसके विपरीत खूंटी, लोहरदगा और सिमडेगा जैसे जिलों में समितियों और सदस्यों दोनों की संख्या काफी कम है, जो क्षेत्रीय असंतुलन की ओर इशारा करता है.
गांव से शहर तक बढ़ रहा सहकार का भरोसा
गिरिडीह, दुमका और धनबाद जैसे जिलों में 7 से 8 प्रतिशत के बीच सदस्य भागीदारी यह दर्शाती है कि सहकारी मॉडल पर लोगों का भरोसा लगातार बढ़ रहा है. ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में लोग इस व्यवस्था से जुड़ रहे हैं. राज्य में 12,000 से अधिक समितियों का होना इस बात का संकेत है कि सरकारी योजनाओं को जमीनी स्तर तक पहुंचाने के लिए एक मजबूत ढांचा तैयार हो चुका है, जो आने वाले समय में विकास की रफ्तार को और तेज कर सकता है.
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असंतुलन बना चुनौती, कई जिले अब भी पीछे
हालांकि इन सकारात्मक संकेतों के बीच कई चुनौतियां भी सामने हैं. एक ओर रांची में 2,000 से अधिक समितियां हैं, तो दूसरी ओर खूंटी में केवल 171 और सिमडेगा में 192 समितियां ही सक्रिय हैं. बोकारो में समितियों की संख्या 854 होने के बावजूद वहां सदस्य भागीदारी मात्र 3.85 प्रतिशत है, जो चिंता का विषय है. लोहरदगा और जामताड़ा जैसे छोटे जिलों में बुनियादी ढांचा कमजोर होने के कारण सहकारी मॉडल की रफ्तार धीमी है, जिससे राज्य में संतुलित विकास की राह अब भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है.
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