Ranchi: देश में अब पश्चिमी अवधारणा वाले सस्टेनेबल डेवलपमेंट की जगह भारत के पारंपरिक सनातन विकास मॉडल को अपनाने की पुरजोर वकालत की गई है. जमशेदपुर के मोतीलाल नेहरू पब्लिक स्कूल में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय नदी पर्वत सम्मेलन के समापन पर यह क्रांतिकारी विचार उभरकर सामने आया. सम्मेलन में पर्यावरणविदों ने स्पष्ट किया कि वर्तमान विकास मॉडल असल में विनाश का मॉडल है और अगली पीढ़ी को बचाने के लिए निरंतर चलते रहने वाले सिद्धांत पर आधारित सनातन विकास ही एकमात्र विकल्प है.


“आज पहले विनाशकारी विकास किया जाता है” : सरयू राय
विधायक सरयू राय ने कहा कि आज पहले विनाशकारी विकास किया जाता है, फिर नदियों और पहाड़ों को बचाने की औपचारिकता निभाई जाती है. उन्होंने केंद्र सरकार के 2030 के सस्टेनेबल लक्ष्यों पर तंज कसते हुए कहा कि जमीन पर कुछ होता नहीं दिख रहा.
वहीं सम्मेलन के अध्यक्ष व मैग्सेसे पुरस्कार विजेता जलपुरुष राजेंद्र सिंह ने कहा, “अगर हम ‘माई’ (प्रकृति) कहकर सिर्फ कमाई की सोचेंगे, तो न नदियां बचेंगी और न ही पहाड़. प्राकृतिक संसाधनों को सिर्फ इकोनॉमिक इन्फ्रास्ट्रक्चर मानना देश की सबसे बड़ी भूल है.”
इस अवसर पर विधायक सरयू राय की अंग्रेजी पुस्तक चेंजिंग फेस ऑफ सारंडा तथा अंशुल शरण द्वारा संपादित 126 पृष्ठों की पर्यावरण केंद्रित स्मारिका का भी विमोचन किया गया.

एक हफ्ते में तैयार होगा कानून का फाइनल ड्राफ्ट
सम्मेलन में पुराने कानूनों के लागू न होने पर चिंता जताई गई. जनता को नया कानूनी हथियार देने के लिए प्रो अंशुमाली और प्रो पीयूष कांत पांडेय को एक सप्ताह के भीतर पर्वत संरक्षण अधिनियम का फाइनल ड्राफ्ट तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है.
प्राप्त हुए सुझावों के अनुसार, इस नए कानून की भाषा बेहद सरल होगी, पहाड़ों की अकाट्य परिभाषा तय की जाएगी और ब्लास्टिंग व अवैध खनन पर पूर्ण रोक का प्रावधान होगा.
क्या है घोषणा पत्र का संकल्प
• पर्वतीय पारितंत्र और नदियों को जल सुरक्षा व करोड़ों लोगों की आजीविका का मुख्य आधार मानना.
• आदिवासियों और स्थानीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान को संरक्षण का मुख्य जरिया बनाना.
• नदियों और पर्वतों के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत विधिक ढांचा तैयार करना.
• देशव्यापी परामर्श के जरिए एक वर्ष के भीतर कानून का प्रारूप तैयार करना.
• केंद्र और राज्य सरकारों से इस ड्राफ्ट को पर्वत संरक्षण अधिनियम के रूप में संसद और विधानसभाओं में पारित कराने का आग्रह करना.

